घोड़े की सवारी से जो काम न हो सका, वो काम “साइकिल” कर दिखाएगी !!
विशेष संवाददाता
”मुहर लगेगी हाथी पे, वरना गोली चलेगी छाती पे” ! बुंदेलखंड के जंगलों-गांवों में ये “नारा” लगाने वाला खुंखार डाकू ददुआ का बेटा वीर सिंह इन दिनों चुनाव लड़ रहा.
ददुआ अब मारा जा चुका है. पिछले चुनाव में उसने दल बदल करके हाथी के बजाय साइकिल की सवारी शुरू की. साइकिल का टायर पंक्चर हुआ और माया की पुलिस ने ददुआ को मार गिराया.
तीन दशक तक ददुआ का आतंक और रोबिन्हुडगिरी चलती रही थी. अनेक किस्से-कहानियाँ सुनी जाती हैं उसकी. उसके बल पे अनेक लोग नेता बने, और नेता बनके “डाकू” बने. यानि जनता को लूटने के काम किये. कम से कम दस विधान सभा सीटें ददुआ का “कार्य क्षेत्र" रहीं.
ददुआ ने अपना साम्राज्य बनाये रखने के लिए “समाज सेवा” के अनेक काम किये, जो कि नेता से डाकू बने नेताओं-मंत्रियों ने नहीं किया. ये है बुनियादी फर्क जंगल के डाकू और नेता में.
ददुआ पुत्र ने देखा कि उसके पिता का नाम लेकर अनेक लोग नेता-मंत्री बन गए, तो वो क्यों नहीं. बदनामी के डर से किसी दल ने उसे टिकट देना नहीं चाहा तो वह सदल-बल चढ बैठा मुलायम के दफ्तर. आखिरकार उसे टिकट मिल ही गया. (कहां हो अखिलेश? आपने तो कहा था कि दागदार लोगों को आपके यहां टिकट नहीं मिलती !!) सपा वालों का कहना है कि वीर सिंह डाकू नहीं. उसे उसके पिता के अपराध की सज़ा क्यों मिले ? लेकिन, वीर पे भी अपहरण, हत्या, और फिरौती के कोई नौ मामले तो चल ही रहे हैं.
बहरहाल, उत्तर प्रदेश में अनेक उम्मीदवार कुछ इसी तरह के हैं. ऐसे में अकेले ददुआ -पुत्र को “दोष” देना ठीक नहीं. सभी दलों में हैं अनेक ददुआ-पुत्र या खुद ददुआ.
ददुआ-पुत्र का कहना है कि वो नेता बनके समाज सेवा करेगा. गरीबों की भलाई के काम करेगा. अब्दी अच्छी बात. जो काम नेता से डाकू बने लोग नहीं कर सके, वो काम अगर डाकू-संतान और खुद भी एक अपराधी नेता बनके कर सके तो देश का कल्याण !! लेकिन...... ???? एक बड़ा सवालिया निशान..?
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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012
“घुडसवार” ददुआ के पुत्र वीर सिंह ने शुरू की “साइकिल यात्रा”
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
चेर्नबिल त्रासदी से नयी चेतना की उत्पत्ति
सम्पादकीय
चेर्नबिल त्रासदी से नयी चेतना की उत्पत्ति
किरण पटनायक
भारत में हुए भोपाल गैस काण्ड को हुए २५ साल से ज्यादा बीत चुके. उसके बाद भारत जैसे "पिछड़े" देश में भी एक नयी चेतना पैदा हुई. सरकारों में नहीं, राजनीतिक दलों में नहीं, बल्कि आम जन-गण में. इसीलिए आज देश के विभिन्न प्रान्तों में स्वतः स्फूर्त रूप से पर्यावरण की रक्षा, जंगल-झाड़ की रक्षा के अभियान-आन्दोलन चलने लगे हैं. बल्कि कहा जाय कि भोपाल गैस त्रासदी की घटना के पहले से ही प्रकृति बचाओ आंदोलनों की शुरुआत इस देश में हो चुकी थी, गैस काण्ड के बाद जिसमें गुणात्मक तेजी आयी.
जहाँ तक केंद्र सरकार सहित विभिन्न राज्य सरकारों की बात है, तो ये आज भी ५० साल पुरानी और पिट चुकी "पश्चिमी नीति" की नक़ल करके खुद को बड़े प्रगतिशील समझ कर "देश के विकास" का राग अलाप रही हैं. इन्हें भोपाल गैस काण्ड और चेर्नबिल परमाणु त्रासदी के बाद भी होश नहीं आया है. विभिन्न राजनीतिक दल आज भी परमाणु ऊर्जा को अनिवार्य रूप से जरुरी बताकर देश सहित दुनिया का संकट बढाने में जुटे हुए हैं. इसके लिए खासकर कांग्रेस की साम्राज्यवाद-परस्त नीतियाँ ही जिम्मेवार हैं. अपने अस्थायी और सामयिक निजी स्वार्थ के लिए बड़े उद्योगपति और उनकी मीडिया इस विध्वंसकारी नीति में कांग्रेस सरकार का साथ दे रही है.
दिल्ली के कबाड़ से निकले जानलेवा रेडीएशन से देश की सरकार और दलों को सचेत हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे कि केंद्र सरकार को होश आया है. हर बड़े मामलों की तरह इस पर भी लीपापोती की जाने लगी है. जब इतने छोटे से रेडीएशन के एक्सपोजर से कई लोगों की जान जा सकती है या उन्हें जीवन-मरण की लड़ाई लडनी पड़ रही हो, तब चेर्नबिल या भोपाल जैसे कांडों के घटित होने की भयावहता को समझा ही जा सकता है. लेकिन अमेरिकी हाथों की कठपुतली मनमोहन सरकार से ऎसी किसी समझदारी की उम्मीद करना रेत से तेल की आशा करने जैसा ही है. जो सरकार अपने देशवासियों को अब तक यूनियन कार्बाइड और डाऊ जैसी अमेरिकी कंपनियों से उचित मुआवजा दिलाने में विफल साबित हो चुकी हो, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है.
यह सरकार तो इतनी घटिया और निर्मम है कि यह अब फिर से डाऊ (यूनियन कार्बाइड) को वापस लेन के लिए दाँव-पेंच में लगी हुई है. इतना ही नहीं, अमेरिका की यह दलाल सरकार अब इसकी गारंटी में भी लगी हुई है कि भोपाल या चेर्नबिल जैसी कोई बहुत भयंकर घटना घट जाय तो अमेरिकी- यूरोपीय कंपनियों को मुआवजा नहीं देना पड़े और उन पर मुकदमा भी न हो. इसीलिए पिछले दिनों संसद में परमाणु दायित्व विधेयक लाने का प्रयास किया गया था, मगर जोरदार विरोध की आशंका के मद्देनजर इसे फिलहाल गतालखाते में रख छोड़ा गया है. इसे ही कहते हैं देशद्रोह. सिर्फ माधुरी गुप्ता जैसे लोग ही देशद्रोही नहीं होते, बल्कि देश विकास के नाम पर देश की जनता के जीवन को खतरे में डालने वाली सरकार भी देशद्रोही हो सकती है. ऐसे देशद्रोहियों और जनता की दुश्मन सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए देश की आम जनता को एक नयी चेतना से लैस होना जरुरी है. जैसा कि चेर्नबिल काण्ड के बाद उक्रेन और सोवियत देशों सहित यूरोप में एक हद तक हुआ और हो रहा है.
२५-२६ अप्रैल 1986 की रात में चेर्नबिल काण्ड को हुए साल हो चुके. इस काण्ड ने पूरे यूरोप में एक नयी चेतना को जन्म दिया, विशेषकर "सोवियत" देशों में. राजनीतिक रूप से इस चेतना को किसी विचारधारा के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता. न साम्यवादी, न पूंजीवादी. यह शुद्ध रूप से पृथ्वी सहित मानवीय अस्तित्व की रक्षा से जुड़ी चेतना है.
यह और बात है कि इसका सरासर अनुचित इस्तेमाल करने में पूंजीवादी - साम्राज्यवादी शक्तियां जुट गयीं. इस वर्ग विभाजित विश्व में अगर किसी नयी चेतना के साथ वर्ग दृष्टिकोण न हो तो उसका नाजायज लाभ पूंजीवादी ताकतें उठाया करती हैं. इसे सोवियत यूनियन में देखा गया. इसका खामियाजा वहां के मजदूर वर्ग सहित दुनिया के मेहनतकश अवाम को भरना पड़ रहा है. उस नयी व शुद्ध चेतना का अनुचित लाभ उठा कर देश-दुनिया का शोषक वर्ग मेहनतकशों से उनके अधिकार छीनने के प्रयास में जुटा हुआ है, जो अधिकार अमेरिका के शिकागो में १ मई के रक्तरंजित युद्ध के बाद प्राप्त होना शुरू हुआ था.
मई दिवस के अवसर पर जनसमाचार भोपाल और चेर्नबिल काण्ड के पीड़ितों के साथ अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए भारत सहित विश्व के आम लोगों का आह्वान करना चाहता है कि सरकारों की ऎसी हर कार्रवाई का पुरजोर विरोध किया जाय , जो आम जनता सहित पूरी मानवता और इस हमारी जननी पृथ्वी के लिए घातक हो. ऐसे अनेक आन्दोलन देश के विभिन्न क्षेत्रों में चल भी रहे हैं. इन्हें और भी आगे बढ़ाकर सचेत रूप से वर्ग दृष्टिकोण के तहत ऐक्यबद्ध करना जरुरी है। इसे राजनीतिक सिद्धांतों के घेरे में बांधना भी उचित नहीं। क्योंकि , जैसा कि पहले ही कहा गया है, यह मानवता और पृथ्वी की रक्षा का आन्दोलन है.
बहरहाल, सोवियत संघ सहित यूरोप में २७ अप्रैल तक किसीको इसका पता ही नहीं था कि चेर्नबिल के चौथे रिएक्टर में हुए विस्फोट के कारण नागासाकी-हिरोशिमा से चार सौ गुना अधिक सेजियम-१३७, स्ट्रेंसीयम-९० और अन्यान्य पदार्थो से रेडियोधर्मिता वातावरण में फैलती जा रही है. चेर्नबिल पूर्व सोवियत देश उक्रेन में है. राजधानी किएव से मात्र १३५ कि.मी. दूर. यह "दुर्घटना" रासायनिक थी, नाभिकीय नहीं. नाभिकीय होती तो न जाने क्या होता?
इसका असर स्पेन को छोड़ कर लगभग पूरे यूरोप में इसका दुष्प्रभाव पड़ा. उक्रेन और पूर्व यूरोप के वरिष्ठ पर्यावरण नेता विटाली कनोनौव के अनुसार "२५ अप्रैल की रात वहां ३६० लोग कार्यरत थे. उनमे से अब कोई नहीं बचा. कोई उसी समय मारे गये तो एनी कुछ महीनों बाद. वहां के कर्मचारियों के परिवारों को प्रिपीयात शहर से बाहर ले जाते समय अधिकारियों ने कहा था कि ज्यादा सामान ले जाने की जरुरत नहीं, क्योंकि जल्द ही वापस आजाना है. यह झूठ नहीं कहने से अच्छा होता. आम लोगों को संकट की भयावहता के बारे में बताना जरुरी था. " वे सभी दस साल बाद १९९६ में ही वापस आ सके , जो बचे रह गये थे.
राष्ट्र संघ के चेर्नबिल फोरम के अनुसार २८ अग्निशमन कर्मचारियों के अलावा ६०० लोगों की मृत्यु उसी समय हो गयी थी. इसके बाद भी इस दुर्घटना से लोगों का मरना जारी रहा. छः लाख से ज्यादा लोगों पर रेडिएशन का दुष्प्रभाव पडा. कम से कम चार हजार लोगों की मृत्यु थायरायड कैंसर से हुई और हो सकती है. लोगों के दिमाग और मानसिकता पर चेर्नबिल का बहुत ही गभीर प्रभाव पड़ा. इससे एक नयी चेतना का विकास आरम्भ हुआ. विटाली कनोनौव के इस मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से अनेक लोग सहमत नहीं होने के बावजूद यह बड़े हद तक सच है. क्योंकि इसके बाद से ही यूरोप में पर्यावरण आन्दोलन का आरम्भ हुआ, जिसे वहां ग्रीन आन्दोलन कहा जाता है.
इतना ही नहीं, इसके बाद से सोवियत संघ के पतन की भी शुरुआत हुई. उसके पतन के और भी कई प्रमुख कारण हैं, जिन पर काफी चर्चा हो चुकी है और आगे भी होगी, मगर कनोनौव के विश्लेषण को भी नकारा नहीं जा सकता. यहाँ इस बहस का प्रारम्भ करना प्रासंगिक होगा कि “सोवियत संघ ने मानवता और इस सृष्टि की रक्षा में खुद की बलि चढ़ा दी”. यह काम अमेरिका जैसा कोई साम्राज्यवादी-पूंजीवादी देश नहीं कर सकता. हालाँकि सोवियत संघ के पतन के अन्य राजनीतिक-आर्थिक कारण भी हैं. फिलहाल, यह अलग लम्बी बहस का मुद्दा है.
विटाली कनोनौव कहते हैं कि "तबसे ही हमारे यहाँ सब्ज आन्दोलन शुरू हुआ. उससे विभिन्न संस्थाओं का जन्म हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी के साथ मिल-जुल कर. लोगों के बहुत करीब जाकर हमने काम किये. यह काम अनेक दिनों से नहीं हो रहा था. सत्ता में रहते-रहते ऐय्याशी बढ़ गयी थी. सही काम नहीं हो रहा था. लोगों को आतंकित किया जा रहा था. इसीलिए नयी चेतना का उदय हुआ. इस चेतना की उदगम वही चेर्नबिल है. "
लेकिन कम्युनिष्ट होते हुए भी कनोनौव एक बात भूल गये कि वर्ग नजरिये के बिना कोई भी नयी चेतना अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती. इसी कारण उस नयी चेतना का इस्तेमाल करके साम्राज्यवादी देश पूर्व सोवियत देशों सहित विश्व में अपना एजेंडा लागू करने के षड्यंत्र में व्यस्त हैं. ग्लोबल वार्मिंग के मामले में भी ये देश अपने स्वार्थों को सर्वोपरी रख कर अपनी मनमानी चलाने के प्रयास में लगे हुए हैं.
इसीलिए कनोनौव भी स्वीकार करते हैं कि ”यूरोप की संसदों में सब्ज आन्दोलन के प्रतिनिधियों की भरमार के बावजूद अमेरिका-यूरोप सहित अन्य पूंजीवादी देशों को होश नहीं आया है. इसीलिए भी इतनी बड़ी दुर्घटना के बावजूद चेर्नबिल संयंत्र को बंद करते चार-पांच साल लग गये थे. उनके अनुसार अभी भी कोयला-गैस या फौसिल फ्युएल की तुलना में परमाणु ऊर्जा को कहीं अधिक सुरक्षित माना जा रहा है, यह सच नहीं है, चेर्नबिल से सबक लेनी चाहिए.” भारत की सरकार तो ऎसी कोई सबक लेने से रही, लेकिन आम लोग अगर इससे सबक ले लें तो वे ऎसी मानवता-विरोधी सरकारों को सबक जरुर सीखा सकते हैं. .(समाप्त)
रविवार, 22 जनवरी 2012
अपने ही बच्चों की जान के दुश्मन न बनें
बचपन को बचपन - जिंदगी को जिंदगी रहने दें
रेस का घोडा न बनाएँ
विशेष संवाददाता
विपिन के पिता रेलवे में हैं। मां घरेलू महिला। विपिन दो भाइयों में बड़ा है और अगले साल उसको ज्वाइंट एंट्रेंस की परीक्षा देनी है। छोटा भाई नरेंद्रपुर रामकृष्ण मिशन बोर्डिंग स्कूल में है। विपिन की सबसे बड़ी समस्या खुद उसके पिता ही हैं। वह साफ-साफ कहता है कि पिता के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं हैं। क्यों? जब वह अच्छे नंबर लाता है तो पिता उसके साथ बहुत अच्छा सलूक करते हैं। लेकिन पहले की अपेक्षा जरा भी कम नंबर लाने से पिता का व्यवहार किसी दुश्मन जैसा हो जाता है। एसएससी परीक्षा में 90 फीसदी नंबर लाकर विपिन फर्स्ट आया था। तब पिता की आंखों का तारा बन गया। लेकिन हायर सेकेंड्री में वह इतना अच्छा न कर पाया। और तबसे पिता के साथ उसकी एक दूरी बन गयी। उसका कहना है कि वैसे भी उसके पिता स्वभाव से बहुत ही चिड़चिड़े किस्म के इंसान हैं। मां के साथ भी उनका बहुत अच्छा व्यवहार नहीं है।
विपिन बताता है कि बचपन से ही उसके पिता उसे पढ़ाते रहे हैं। और पढ़ाने के दौरान वे अक्सर मार-पीट किया करते रहे। परीक्षा में एक नंबर के प्रश्न का उत्तर भी गलत लिख कर आने पर अच्छी-खासी धुलाई होती। और इस पर अगर मां बीच-बचाव करती तो उन्हें भी खरी-खोटी और अपमानजनक बाते सुननी पड़ती। इतना ही नहीं, विपिन के पिता की सोच अन्य अनेक पिताओं से बिल्कुल अलग है। बचपन से ही उन्होंने अपने बच्चों को सिर्फ टीवी से ही नहीं, नाच-गाना, खेल-कूद; यहां तक कि कहानी की किताबों तक से भी दूर रखा। उनका मानना है कि इन सबसे समय नष्ट होता है। ऐसे में विपिन मां को अपने बहुत करीब पाता है। मां से उसका रिश्ता दोस्ताना है। मां विपिन से कहती है कि डॉक्टरी में चांस लेकर वह हॉस्टल चला जाए। ताकि शांति से पढ़ाई-लिखाई कर सके। इसीलिए विपिन एंट्रेंस के लिए जी-जान लगाकर तैयारी कर रहा है।
यह तो हुई विपिन की बात। आइए अब देखते हैं रोहन की समस्या। बचपन से ही रोहन पढ़ाई-लिखाई में बहुत ही अच्छा है। माता-पिता के साथ भी उसका संबंध बहुत अच्छा रहा है। 2007 में एसएससी की परीक्षा में 94 फीसदी नंबर लाकर दक्षिण दिनाजपुर जिले में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इसके बाद गांव से वह कोलकाता चला आया। यहां हायर सेकेंड्री में वह प्रथम नहीं आ पाया। उसके नंबर महज 85 फीसदी रहे। रोहन की समस्या है कि 85 फीसदी नंबर लाने के बावजूद आज माता-पिता, पड़ोसी और यहां तक कि स्कूल के शिक्षक भी उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। उसे फिकरे सुनने पड़ते हैं। और यह उसे किसी भी कीमत में बर्दास्त नहीं हो रहा है।
आगे की पढ़ाई के लिए पहले तो कोलकाता के एक कॉलेज में उसने दाखिला लिया। लेकिन पारिवारिक दवाब के कारण उस कॉलेज को छोड़कर हुगली जिला के एक गैर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में दोबारा दाखिला लेना पड़ा। उसके माता-पिता का मानना है कि इंजीनियरिंग ही एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें मोटी रकम कमाने की गुंजाइश है। जबकि वह आईएएस बनना चाहता था। अब कुंठित मन से वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो कर रहा है। लेकिन जीवन के प्रति उसके मन में वितृष्णा भर गयी है। मायूसी भरे क्षण में बार-बार रोहन यही कहता रहता है कि अब उसकी जिंदगी में कुछ रस नहीं है। सब कुछ खत्म हो गया। जीने का कोई मतलब नहीं रहा।
आजकल की नौजवान पीढ़ी को ऐसे ही या इसी तरह की समस्या से अक्सर दो-चार होना पड़ता है। माता-पिता बच्चों पर अपने सपने लाद रहे हैं। कुछ माता-पिता की नजरों में बच्चे किसी विनिवेश से कम नहीं हैं। यानि कितना पैसा लगाया और कितना मिलेगा – जैसी सोच हावी हो गयी है। कहने की जरूरत नहीं कि बच्चों के साथ यह सरासर अन्याय है। बच्चों के साथ घरेलू हिंसा आज आम है, फिर वह शारीरिक हो या मानसिक। और यह सब बाल अधिकारों का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जो लोग हिंसा कर रहे हैं वे उनके बेहद करीबी लोगों में से हैं।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान बच्चों-किशोरों का ही होता है। उनके मन में नकारात्मक भावना घर कर जाती है। और कभी-कभी इसका असर कुछ इस तरह होता है कि उनके मन में जीवन से मुंह मोड़ने की भावना पैदा होने लगती है। यही कारण है कि आजकल युवाओं में आत्महत्या की वारदातें बढ़ रही है। और शिक्षा को लेकर चूहा दौड़ का ऐसा दौर शुरू हो चुका है कि युवा पीढ़ी पर हर जगह अव्वल होने का दबाव बढ़ता ही चला जा रहा है। और चिंता का विषय है कि यह दबाव उनके माता-पिता की ओर से पड़ रहा है। हरेक माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा शीर्ष स्थान पर हो। लेकिन जहां तक दिमागी संरचना का सवाल है हर किसीका दिमाग एक-सा नहीं होता। प्रतिभा हर किसीमें होती है। लेकिन जरूरी नहीं कि वह प्रतिभा तथाकथित रूप से किसी विषय विशेष शिक्षा से ही जुड़ी हो। ऐसे में अधिक दबाव न सह पाने की स्थिति में युवा जीवन से विमुख होने को मजबूर हो रहे हैं।
कम उम्र के युवाओं व किशोरों की अकाल मृत्यु के दस कारणों में से एक आत्महत्या ही हुआ करती है। यही नहीं, युवाओं की बात अगर जाने भी दें तो समाज में चल रही भयंकर प्रतिस्पर्धा ही वह विडंबना है कि आठ-नौ साल के छोटे बच्चे भी परीक्षा के खराब नतीजे के कारण आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। जाहिर है इसके लिए माता-पिता ही मुख्य रूप से दोषी हैं। विपिन और रोहन के मामले में भी यही बात साबित होती है। इन दोनों पर भी अच्छे नतीजे के लिए इस तरह दबाव बनाया गया कि रिश्ते पर आंच आ गयी है। और जीवन बेरस होता जा रहा है।
मनोचिकित्सक रीमा मुखर्जी का कहना है कि माता-पिता बच्चों के लिए मानसिक-भावनात्मक खुराक का काम करते हैं, इसीलिए बच्चे उनसे अच्छे दोस्त और हमदर्द होने की अपेक्षा रखते हैं। लेकिन “आधुनिक” माता-पिता अपने ही बच्चों के जान के दुश्मन बनते जा रहे हैं। यही माता-पिता है जो बच्चों में अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा की भावना जगाते हैं। महत्वाकांक्षा और उच्चाकांक्षा में फर्क करना जरूरी है। अपनी उच्चाकांक्षा बच्चों पर नहीं लादनी चाहिए, कि उनका नौनिहाल जीवन से नाता तोड़ने की सोचने लग जाए।
जुवेनाइल वेलफेयर बोर्ड के मनोचिकित्सक हिरण्मय साहा का कहना है कि ज्यादातर मामलों में किशोरों और युवाओं की असली समस्या उनके घरों से ही शुरू होती है। अभिभावक व माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता जाने बिना उनसे कुछ अधिक अपेक्षाएं कर लेते हैं। किसी सूदखोर या मुनाफाखोर साहूकार की तरह नफा-नुकसान का हिसाब लगाने लग जाते हैं। जैसा कि विपिन और रोहन के मामले में देखने में आया। बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च या मेहनत किया और बदले में कितने नबंर आए?
रीमा मुखर्जी कहती हैं कि परीक्षा के नतीजे के आधार पर अगर परिवार का प्रेम निर्भर करता है तो इससे बड़ी हताशा की बात और क्या हो सकती है? माता-पिता व परिवार का दूसरा नाम ही आत्मीयता और सहयोग है। और यह बच्चों को मिलना ही चाहिए, लेकिन खेद का विषय यह है कि यह मिल नहीं पा रहा है। माता-पिता के प्रेम में मिलावट आ गयी है, वे बच्चों की शिक्षा के मद में किए गए खर्च को निवेश के रूप में देखने लगे हैं।
हिरण्मय इन सबके लिए शिक्षा पद्धति को भी जिम्मेवार ठहराते हुए कहते हैं कि किसी भी बोर्ड की परीक्षा का नतीजा आने के साथ मेरिट लिस्ट और टॉप टेन को लेकर इतना हंगामा मचता है कि अगले साल परीक्षा देनेवालों पर अपने आप दबाव बढ़ता चला जाता है। हाल ही में बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रेड दिए जाने की घोषणा की गयी, लेकिन हमारी सोच ऐसी हो गयी है कि वहां भी ग्रेड को लेकर हंगामा मचना निश्चित है। शिक्षा का मकसद नित नयी चुनौतियों के लिए बच्चों तैयार करना है, न कि आपसी प्रतिस्पर्धा में सिर-फुटौव्वल के लिए और हताशा-निराशा को बढ़ावा देने के लिए।
इस सिलसिले में कुछ समाजविज्ञानियों की राय है कि फिल्म ‘तारे जमीन पर’ को माता-पिता, अभिभावक और शिक्षक-शिक्षिकाएं अवश्य देखें। यह फिल्म बच्चों के लिए नहीं; बल्कि अभिभावकों के लिए है। (समाप्त)
शनिवार, 21 जनवरी 2012
हिंदी के साथ ये अन्याय क्यों?
हिंदी के लिए सुसमाचार
राष्ट्र भाषा के नाते हिंदी को इसका सम्मान कब का मिल जाना चाहिए था जो कि अब तक नहीं मिला। हिंदी को तमाम राज्यों में अनिवार्य विषय बना दिया जाना चाहिए था, मगर यह अब तक नहीं हो पाया। कई गैर हिंदी राज्यों में एक वैकल्पिक विषय के रूप में यह पढ़ाई जाती है, जबकि लादी गयी साम्राज्यवादी अंग्रेजी ज्यादातर राज्यों में अनिवार्य है। और तो और, हिंदी भाषी राज्यों में इसकी उपेक्षा की जा रही है। हिंदी के बजाए अंग्रेजी को तरजीह देने की प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ रही है। अनेक शिक्षा संस्थानों में हिंदी को दूसरी भाषा का दर्जा प्राप्त है। लेकिन अंग्रेजी को प्रथम स्थान। यह हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं के साथ भीतरघात है। यह भीतरघात सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर हो रहा है. ऐसे में जरूरी है कि आमलोग जागरूक बने। अपनी सदियों पुरानी राष्ट्रीयता को पहचाने और हिंदी भाषा की अस्मिता और भारतीय राष्ट्रीयता के लिए आगे आए, और अंग्रेजी के बढूते वर्चस्व को समाप्त कर राष्ट्र भाषा को स्थापित करे।
बहरहाल, इस अंधकार में असम से आशा की एक किरण आती दिख रही है। हिंदी को अनिवार्य शिक्षा बनाने की दिशा में बढ़ रहा है असम। वहां के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने दसवीं की परीक्षा में हिंदी को अनिवार्य करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। बोर्ड सचिव डी. महंत के अनुसार, ‘भारत में विभिन्न प्रकार की स्थितियों का सामना करने के लिए हिंदी जानना जरूरी है।‘
प्रस्ताव अभी आया भी नहीं था कि असम, बंगाल के मुट्ठी भर लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। ये चंद लोग शुरूआत से ही अंग्रेजों और अंग्रेजी के भक्त रहे हैं। ऐसे ही एक अंग्रेजी भक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इंग्लैंड में जाकर पिछले दिनों भारत में ब्रिटिश शासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। ऐसे ही गुलाम मानसिकता के लोगों ने ही आजादी प्राप्ति के पहले से ही हिंदी का हौवा खड़ा करना शुरू कर दिया था। अंग्रेज सांप्रदायिक भेदभाव के साथ-साथ भाषाई भेदभाव को भी बढ़ावा देने में लगे रहे। अब भी अंग्रेजों, अमेरिकियों और अंग्रेजी के भक्तों ने भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाते रहने की नीति जारी रखा हुआ है। यह और बात है कि बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल, आंध्र, महाराष्ट्र, मणिपुर, गुजरात, मेघालय आदि के करोड़ों आमलोग अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी को ही पसंद किया करते हैं। स्थानीय या प्रांतीय भाषा की रक्षा के नाम पर अहिंदी भाषी राज्यों में बहुत दिनों से राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं, मगर सच्चाई यह है कि उन तमाम राज्यों की मातृ भाषाओं की घोर उपेक्षा करते हूए साम्राज्यवादी अंग्रेजी को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। असमिया, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, कन्नड भाषा जाननेवालों को अच्छी-बड़ी नौकरी नहीं मिल पाती। जबकि सिर्फ अंग्रेजी जाननेवालों को बड़े से बड़े पद पर बिठा दिया जाता है। दरअसल, हिंदी का हौआ अंग्रेजी के गुलामों ने ही खड़ा किया है, और इसीके जरिए वे लोग विभिन्न राज्यों सहित भारत के उच्चपदों पर कब्जा जमाये हुए बैठे हैं। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण ही प्रांतीय भाषाओं और भाषा-भाषियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। बंगालियों और तमिलों को इस पर गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।
बहरहाल, तमाम विरोधों को बावजूद असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का मानना है कि असमियों की बहुमुखी तरक्की के लिए हिंदी सीखना अनिवार्य रूप से जरूरी है। बोर्ड सचिव डी. महंत कहते हैं कि फिलहाल, हिंदी पांचवीं कक्षा से सातवीं तक पढ़ाई जाती है। मगर अधिकांश विद्यार्थी इसे सतही ढंक से ही पढ़ते हैं। ऐसे में जब वे राज्य से बाहर जाते हैं तब उन्हें बड़ी दिक्कत पेश आती है। इसीलिए पांचवीं से दसवीं तक हिंदी पढ़ना और उसमें उत्तीर्ण होना अनिवार्य किए जाने का प्रस्ताव है। यहां प्रसंगवश इसका उल्लेख किया जा रहा है कि बंगाल और तमिलनाडु ने हिंदी का विरोध करनेवाले कुछ लोग जब कभी चेन्नई, मुंबई, कोलकाता या दिल्ली जाते हैं तब अकसर हिंदी को अनिवार्य रूप से जरूरी करार देते हैं। बल्कि प्रणय रॉय जैसे अंग्रेजीदां जो हिंदी का एक शब्द भी बोलना अपना अपमान समझते हैं, भी जब दक्षिणी राज्यों में जाते हैं, तब वे भी हिंदी की अनिवार्यता महसूस करने लगते हैं।
इसी बात को असम शिक्षा बोर्ड ने भी महसूस किया और इसे व्यापक समर्थन भी मिल रहा है। सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के एक प्राचार्य पवित्र कुमार डेका, डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति कमलेश्वर बोरा ने इस प्रसताव का स्वागत किया है। असम के नौजवानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी हिंदी लिखना, पढ़ना और बोलना चाह रहा है। अनेक विद्यार्थी चाहते हैं कि जल्द से जल्द हिंदी की अनिवार्य पढ़ाई-लिखाई शुरू हो।
तमिलनाडु, आंध्र, करेल, मिजोरम, मेघालय आदि राज्यों में भी हिंदी की पढ़ाई की और आमलोगों का झुकाव देखा जा रहा है। यह एक अच्छी खबर है। मगर अफसोस की बात यह है कि हिंदी भाषी राज्य हिंदी की उपेक्षा कर अंग्रेजी को बढ़ावा देने में लेग हुए हैं। कम से कम हिंदी भाषी राज्यों से अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई खत्म कर दी जाए, और बांग्ला, उडि़या, तेलगु, असमिया, मराठी गुजराती, तमिल आदि एक-एक भाषा को अपना लिया जाए तो निश्चत तौर पर इसका प्रभाव अहिंदी भाषी राज्यों पर पड़ेगा। और, हिंदी को वे तहेदिल से राष्ट्र भाषा के रूप में अपना लेंगे। (समाप्त)
सोमवार, 28 नवंबर 2011
आज 'भगवान "अल्लाह "जीसस " भी लाचार है . ....
तो पहला काम .-- ख़ुद को जगाना
कि हम एक हैं ...
और मानव धर्म एक है .....
औरसारे भारतीय ।मेरे भाई बहन हैं ...
ये प्रतिज्ञा सिर्फपाठशाला का एक नियम बनाना .....
नर्सरी में दाखिला लिया ..
पापा फॉर्म भर रहे थे ...
पहला सवाल था .
जाति , धर्म कौन सा ?हिन्दू ....लिंगायत .......
पापा ...ये धर्म क्या होता है ..?
मेरा सवाल था ....
बेटा ..तुम नहीं समझोगी ..
बहुत छोटी हो .....
"आया " ने मेरी ऊँगली थामा ....आया से मैंने पूछा .....आपका धर्म क्या है . ....?मुस्लिम ............
ये था पहला पाठ मेरे बचपन का .....कितना आसान हो गया है ....
खुद को बताना ...
मेरे दादा ..मेरे दादा के दादा ..उनके दादा के दादासभी ने यही सीखा था ..
हम सब एक है ...
मानव धर्म एक है ...
कोई तो मेरे सवालो का जवाब दो ..........?'रामायण कहा से आया ..?
कुरान कहा से आया ..?महाभारत कहा से आया ....?
और ये बायबिल ॥कहा से आयी ...?
कितना आसान हो गया है ..खुद को बताना
आज 'भगवान "अल्लाह "जीसस " भी लाचार है . ....उनके नाम पर ही ॥एक दूसरे को मरोड़ रहे हैं ....
कैंडल भी बहुत जलाए ......
टी वी पर नाम भी फैलाये ....कि ..हम लड़ेगे ....हम लड़ेगे .....दूसरी सुबह ने देखा ...
वो खुद ही लड़ रहे है .....
मै "मारता "...तू मुस्लिम ....वो बिहारी .....आसान हो गया है खुदको बताना
सिर्फ "दिल " से सोचो ...."भारत मेरा देश है ...
और "भारत मेरा घर है "........ हम सब भाई बहन है ...
तो कैंडल भी न हो ...
लिस्ट भी न होख़ुद को जगाओ .......
ख़ुद को जगाओ ...
तो आसान नहीं होगा ख़ुद को जगाना ......
तो ...
ख़ुद को जगाना ......
नंदिनी पाटिल
क्षमा करें गाँधी हमें ....
जब मै नए सदी का हवाला दे रही थी.....
किताब बंद किया अपने नए विचारो और आखो के साथ ...
विचार मेरे गुलाम है ,नए सदी के हाथ .....
नए सदी का पाठ है - आतंकवाद का ...
चरखा यहाँ चलता है,घोटाले घोटालो का.....
धूर्तता की जीत है ,नैतिकता की हार ,
लाचारी की चमडी है ,करो जयजयकार....
सत्ता की है आरती यहाँ, पूजा है कुर्सी की....
प्रसाद है पैसोका , आशीर्वाद मोर्चे , हड़तालों की....
पंडित मुल्ला दो हथियार यहाँ, पाठ यहाँ पर दंगल का......
चरखा यहाँ चलता है , घोटाले घोटालो का.......
कदम चूमती जीत यहाँ ,नई सदी के ..कौरवों की ....
इज्ज़त यहाँ लुटती है, मूल्य और मर्यादा की .....
नई सदी में चिंतन है, शपथ कैसे ले झूठ की ...
नई सदी में मनन है, प्रतिज्ञा कैसे ले फूट की ..
शिकवा करे किससे ? जब बाड़ खाए खेत को ...
आज़ाद भारत में रोज देखते ज़िंदा लाश, ज़िंदा मौत को ...
क्षमा करें गाँधी हमें ....
नई सदी में इंतज़ार है आपका ...
चरखा यहाँ चल रहा है घोटाले- घोटालो का..
-- नंदिनी पाटिल
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011
लड़खड़ाता अमेरिका
अमेरिका का आर्थिक संकट
अंतर्राष्ट्रीय साख निर्धारक संस्था स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एस एंड पी) ने अमेरिकी क्रेडिट की रेटिंग एएए (AAA) से घटा कर एए प्लस (AA+) कर दी। बताया जाता है कि 95 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है। इस खबर ने दुनिया भर के शेयर बाजार को हिला कर रख दिया। भरतीय शेयर बाजार भी औंधे मुंह गिरा। इस आलेख के लिखे जाते समय अपने 14 महीने के सबसे निचले स्तर सूचकांक 16,000 के आसपास पहुंच गया। यही हाल दुनिया के अन्य शेयर बाजारों का भी रहा। असर ऐसा कि महज एक ही घंटे में कुछ लोगों का दिवाला पिट गया। इसीके साथ पूरी दुनिया में एक बार फिर मंदी हावी हो गयी। 2007 की मंदी का असर यह रहा कि अमेरिका में गरीबी का प्रतिशत बढ़ गया है। और 2007 से लेकर 2010 तक के आंकड़े में अच्छा-खासा उल्लेखनीय फर्क नजर आने लगा है।
बताया जाता है कि इसका असर आनेवाले सालों में और भी दिखाई देगा। हाल ही में अमेरिका के सेंसस ब्यूरो की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया है कि 2010 में गरीबी के प्रतिशत में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 15.1 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। 2007 में मंदी की शुरूआत में यह प्रतिशत 2.6 था। जबकि 2009 में 14.3 पर थी। गौरतलब है कि 15.1 का आंकड़ा सेटिंग से पहले का है। चूंकि मंदी का दूसरा दौर चल रहा है, इसलिए जाहिर है अभी इस प्रतिशत में और वृद्धि होगी।
हालांकि पहली नजर में देखने में यही लगता है कि इस रेटिंग में कोई ज्यादा फर्क तो नहीं है, लेकिन जानकारों का मानना है कि चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर विश्व बाजार निर्भर होता है, इसीलिए रेटिंग में हल्की-सी भी कमी का असर दिखना लाजिमी है। इस रेटिंग का कुल मिला कर आशय यह है कि अमेरिका को कर्ज देने में जोखिम है। भले ही ऐसा आनेवाले बहुत थोड़े ही समय के लिए हो; लेकिन जोखिम तो है ही। दुनिया भर में अब तक यह आम धारणा थी कि अमेरिकी सरकार का कोषागार काफी मजबूत है। यह कभी खत्म न होनेवाला कुबेर का खजाना है। इसीलिए इसे कर्ज में देने में कोई खतरा नहीं है। लेकिन एस एंड पी द्वारा हाल ही में की गयी रेटिंग से इस आम धारणा को गहरा धक्का लगा है।
लेहमैन ब्रदर समेत तमाम दिग्गज देश 2008 में आर्थिक मंदी के दौर से गुजर चुके हैं, जिसका असर पूरी दुनिया भर में देखा गया। अभी दुनिया उस झटके से उबर भी नहीं पायी थी कि एक बार फिर से मंदी के बादल मंडराने लगे। ऐसे में भविष्य को सुरक्षित कर लेने की गरज से बराक ओबामा ने कर्ज लेने का फैसला किया। यह मामला जब अमेरिकी कांग्रेस में अनुमोदन के लिए आया। लेकिन बहुमत न होने के कारण ओबामा के प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं मिल सकी। तब रिब्लिकन पार्टी इसके लिए मनाना पड़ा। लेकिन वह तैयार नहीं हुई। इसको लेकर रिब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच लंबी स्नायविक लड़ाई चली। और बाद में कई दिनों की मशककत के बाद ओबामा सरकार रिब्लिकन पार्टी को इसके लिए तैयार करने में सफल हुए।
इससे दुनिया भर में यह संदेश गया कि अमेरिकी मुद्रा कोष लगभग खाली हो गया है। इससे पहले अमेरिका में दिनोंदिन बढ़ती जा रही बेरोजगारी के मद्देनजर राष्ट्रपति बराक ओबामा पर आउटसोर्सिंग को बंद कराने के लिए दबाव डाला गया। इसके बाद अमेरिका में निवेश के लिए राजी करने के लिए दुनिया भर में विभिन्न देशों का वे दौरा भी कर चुके हैं। इन सबसे इस आशंका को बल मिला कि अमेरिका कंगाली के कगार पर है।
साख की रेटिंग का फंडा
बहरहाल, इस पर चर्चा करने से पहले आइए देखें कि यह स्टैंडर्ड एंड पुअर्स कैसी संस्था है? 1906 में अमेरिका में स्टैंडर्ड स्टैटिस्टक ब्यूरो नाम की एक संस्था हुआ करती थी, जो अर्थ-व्यवस्था से संबंधित तमाम सूचनाओं को इकट्ठा किया करती थी। उन सूचनाओं को परे साल भर एक कार्ड के रूप में प्रकाशित किया करती थी। इसकी स्थापना लुतर ली ब्लेके ने की थी। वहीं अमेरिका में 1860 में हेनरी वर्मनम पुअर्स ने एक और कंपनी की स्थापना थी, जो अमेरिका की अर्थ व्यवस्था पर सालाना तौर पर तमाम सूचनाओं को एक किताब के रूप में प्रकाशित किया करती थी। बाद में हेनरी वर्मनम के बेटे हेनरी विलियम इसे संभाला और नाम एच. वी. एंड एच. डब्ल्यू. पुअर्स कंपनी नाम से इसे चलाया। लेकिन 1941 में दोनों कंपनी का विलय हुआ और यह स्टैंर्डड एंड पुअर्स बन गयी और यह वित्तीय सेवा कंपनी के रूप में जानी जानी लगी। वित्तीय शोध, दुनिया भर के स्टौक व बौन्ड का विश्लेषण करने के साथ यह कंपनी सार्वजनिक और निजी कारपोरेशन और दुनिया के तमाम देशों की क्रेडिट की क्रेडिट रेटिंग भी करती है। इसकी रेटिंग को अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज द्वारा मान्यता भी प्राप्त है।
क्रेडिट रेटिंग के लिए ग्रेड निर्धारित है। ये ग्रेड एएए से लेकर डी तक है। हाल ही में स्टैंर्डड एंड पुअर्स संस्था ने विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करके अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था की साख की रेटिंग की है। इसकी रेटिंग के अनुसार मौजूदा समय में अमेरिका की रेटिंग एएए से गिर कर एए भी नहीं, बल्कि उससे भी नीचे एए प्लस हो गयी है। यानि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था की क्रेडिट एएए की सर्वोच्च रेटिंग से एए प्लस के तीसरे पायदान पर पहुंच चुकी है। एसएंडपी ने यह भी कहा है कि यदि आगे भी यही हाल रहा तो वह अमेरिकी ऋण साख को अगले 12 से 18 महीनों में और घटा सकता है। यही दुनिया भर के निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना गया है।
उधर स्टैंडर्ड एंड पुअर्स की रेटिंग का असर जबरदस्त रहा। इतना कि बिकवाली का दौर शुरू हो गया। अमेरिकी बौन्ड के ग्राहक देशों, संस्थाओं और लोगों को भी यह आशंका होने लगी कि अगर अमेरिका का खजाना खाली है तो उनकी रकम का डूबना तय है। वहीं अमेरिका को कर्ज देने वाली संस्थाओं को भी कर्ज की रकम की वापसी को लेकर शंका होने लगी। और लगने लगा कि 2008 की आर्थिक मंदी का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर निकल आया है। इसका असर विश्व की अर्थ-व्यवस्था पर देखने को मिला। और दुनिया के तमाम प्रमुख शेयर बाजारों में भारी उथल-पुथल मच गयी।
विशेषज्ञों का नजरिया
हालांकि इस मुद्दे पर विशेषज्ञों का नजरिया अलग-अलग है। एक खेमे का यह मानना है कि 2008 की स्थिति इससे बिल्कुल अलग थी। बल्कि दोनों स्थितियों में जमीन और आसमान का फर्क है। कोलकाता के जानेमाने अर्थशास्त्री शैबाल कर का मानना है कि यह महज एक आशंका है कि अमेरिका एक बार फिर से आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है। 2008 में जो स्थिति पैदा हुई थी, अर्थशास्त्र की भाषा में वह सब-प्राइम क्राइसिस कहलाती है। उस समय अमेरिकी बैंक और वित्तीय संस्थानों ने ऐसी कंपनी को कर्ज दिया था, जो कर्ज को चुकाने में सक्षम नहीं थी और कंपनी डूब गयी। इसीलिए कर्ज देनेवाली बहुत सारी संस्थाएं रकम वापस न मिलने के कारण मंदी का संकट देखने को मिला। इस बार मामला वैसा नहीं है, बल्कि एस एंड पी की रेटिंग के कारण बाजार में हड़कंप मच है।
हालांकि माना यह भी जा रहा है कि अगर यह आशंका सच साबित हुई तो अमेरिका को अपनी परियोजना से बाहर जाकर कई लाख करोड़ डौलर कर्ज लेना पड़ सकता है। अर्थशास्त्री अभिजीत रायचौधरी कहते हैं कि कर्ज लेने से अमेरिका के सरकारी खजाने पर असर पड़ेगा। ऐसे में कर्ज चुकाने में भी अमेरिका को दिक्कत पेश आएगी। जाहिर है कर्ज देनेवाले का जोखिम बढ़ जाएगा। इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर स्टैंर्डड एंड पुअर्स संस्था ने अमेरिका की क्रेटिड क्षमता के मद्देनजर रेटिंग की। श्री रायचौधरी का मानना है कि दावे कुछ भी किए जाएं; अमेरिका की आर्थिक सेहत के लिए ओबामा प्रशासन और अमेरिकी कांग्रेस के बीच चली रस्साकसी की कीमत अपनी साख गवां कर अमेरिका को चुकानी पड़ी है। और साथ में दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था को भी। 2008 की मंदी के बाद चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा था। लेकिन चीन ने
एस एंड पी से नाराजगी
गौरतलब है कि एस एंड पी की रेटिंग से अमेरिका में बड़ी नाराजगी है। अमेरिकी वित्त मंत्री ने टिमोथी गेथनर ने अपने एक बयान में कहा है कि रेटिंग एजेंसी एस एंड पी ने अमेरिका के वित्तीय बजट के गणित का अच्छी तरह अध्ययन नहीं किया है। बजट करार से एजेंसी ने गलत निर्णय ले लिया। एजेंसी ने अन्य मुद्दों पर ध्यान देने के बजाए पिछले कुछ महीनों से चल रही बकवास बहस पर ज्यादा ध्यान दिया। वहीं ओबामा ने भी अमेकिर ट्रेजरी सुरक्षित होने का दावा करते हुए कहा कि अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग घटाए जाने के बावजूद अमेरिका हमेशा ‘ट्रिपल ए’ देश बना रहेगा। भले ही बाजार ऊपर नीचे होता रहे, पर अमेरिका ट्रिपल ए देश बना रहेगा। अमेरिका की केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने अपने एक बयान में कहा है कि स्टैंडर्ड एंड पुअर्स की रेटिंग का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी सिक्योरिटी पर कुछ समय के लिए असर रहेगा, क्योंकि अन्य कई बड़ी रेटिंग एजेंसियों की नजर में अमेरिका की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था है। चीन ने अमेरिका के सरकारी बांडों में 1600 अरब डौलर का निवेश कर रखा है। जाहिर है चीन को बड़ा धक्का लगा है।
भारत की स्थिति
अमेरिका के मौजूदा हालात पर भारत ने निश्चित तौर पर बड़ी चौकस प्रतिक्रिया जतायी है। लेकिन कुल मिलाकर तमाम आशंकाओं के बीच रिजर्व बैंक से लेकर वित्तीय मंत्री प्रणव मुखर्जी, योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया और वित्ती मंत्री के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु तक – सबने दावा किया है कि यह गंभीर चिंता का विषय नहीं है। इनका कहना है कि भारतीय बाजार की अपनी स्थिति मजबूत है और वह अमेरिका के भरोसे नहीं है। शैबाल कर का भी कहना है कि भारतीय बाजार अपनी ताकत से चलता है। 1997 से लेकर अब तक; यहां तक कि 2008 की वैश्विक मंदी के दौर में भी भारतीय बाजार को ज्यादा नकुसान नहीं उठाना पड़ा है। शेयर बाजार में बिकवाली का जो दौर इस समय चल रहा है, वह घबराहट के कारण है और यह सामयिक है। आनेवाले दिनों में भारतीय बाजार निश्चित तौर पर संभल जाएगा। (समाप्त)
