यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, 23 मई 2012

भारत के स्वदेशी कितने स्वदेशी, कितने विदेशी और कितने इटैलियन!

भारत के स्वदेशी कितने स्वदेशी, कितने विदेशी और कितने इटैलियन !
 
विशेष संवाददाता

भारत के स्वदेशी कहे जानेवाले उद्योगपति टाटा समूह की हैसियत कितनी स्वदेशी है और कितनी स्वतंत्र, इसका पर्दाफाश करनेवाले तथ्य सामने आए हैं। कहा जाता है कि टाटा मोटर्स ने पहली स्वदेशी कारें भारत को दी हैं, लेकिन यह तथ्‍य कम लोगों को पता है कि टाटा समूह कार उत्पादन, वितरण और मार्केटिंग के मामलों में इटली की कंपनी के फ्रंट संगठन के रूप में काम करता रहा है।
 फिएट के सी ई ओ सर्जियो मर्शियोंने
    मोटर कारों के निर्माण और विपण्ण के मामले में फिएट दुनिया की पांच सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। एक करारनामे के तहत टाटा मोटर्स की रंजनगांव स्थि‍त फैक्टरी में टाटा ग्रुप की सारी कारों का निर्माण मूलत: फिएट कंपनी करती रही है। इंजन सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरजों को इटली से आयात किया जाता है। रंजनगांव की टाटा फैक्टरी बुनियादी तौर पर ‘एसंबलिंग शॉप’ है, जहां इटालियन कंपनी के बनाये गए इंजन और पुरजों को जोड़कर अलग-अलग मार्का कर बनायी जाती हैं। टाटा मोटर्स और फिएट के बीच संबंध ठीक वैसा ही है जैसा कि मारूति और जापानी सुजुकी का। मूल सामग्री विदेशी कंपनी की होती है, केवल लेबल भारतीय कंपनी का होता है।
    जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे पता चलता है टाटा कारों को पूरी तरह से भारतीय बताना जनता को गुमराह करना है। गौरतलब है कि टाटा ग्रुप मोटर कारों के नाम पर जो मुनाफा कमाता है, उसका अधिकांश भाग फिएट को चला जाता है। यानि भारत में हो रहे इस मुनाफे से अधिकांश पूंजी निर्माण इटली में होता है। अभी-अभी एक अंग्रेजी दैनिक ने हेडिंग लगायी- फिएट फाइनली सेज, बाय-बाय टू टाटा। यह खबर भी लोगों को गुमराह करने के लिए चलायी गयी है। दरअसल, इस खबर के जरिए यह बताने की कोशिश की जा रही है कि टाटा ग्रुप एक स्वतंत्र और स्वदेशी कंपनी थी, और आगे भी रहेगी। बीच में कुछ दिनों के लिए फिएट के साथ उसका व्यापारिक संबंध था, जो कि अब खत्म हो रहा है। जबकि यह सच नहीं है। टाटा और फिएट के बीच हुए करारनामे के अनुसार फिएट कंपनी टाटा मोटर्स की कारों का निर्माण करती रहेगी और बाजार में फिएट कंपनी अपने नाम की कारों को भी उतारेगी। इस तरह फिएट कंपनी भारत से दोहरा मुनाफा ले जाएगी और पूंजी निर्माण होगा इटली में।

इस करारनामे से यह साफ हो गया है कि उत्पादन और विनिर्माण में दोनों कंपनियां साथ-साथ रहेंगी। सिर्फ वितरण के क्षेत्र में दोनों अलग हो जाएंगी।
   
इन दोनों कंपनियों की संयुक्त घोषणा से यह साफ हो गया है कि भारत के टाटा, अंबानी, बिड़ला आदि महासेठ घराने असल में विदेशी कंपनियों के भारतीय फ्रंट हैं। यही वजह है कि कथित भारतीय महासेठ घरानों का एफडीआई और एफआईआई आदि विदेशी पूंजीनिवेश के बल पर कारोबार चल रहा है। ये घराने लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विदेशी पूंजीनिवेश और विदेशी कंपनियों को भारत लाया जाए।

साफ है नैनो कार का विनिर्माण फिएट ने ही किया है। टाटा उत्पादन के नाम पर जहां-जहां कृषि भूमि या सर्वजनिक भूमि लेने की कोशिश की गयी है या ले ली गयी है वह दरअसल, मूलत: फिएट कंपनी के लिए ही है।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

“घुडसवार” ददुआ के पुत्र वीर सिंह ने शुरू की “साइकिल यात्रा”



घोड़े की सवारी से जो काम न हो सका, वो काम
“साइकिल” कर दिखाएगी !!

विशेष संवाददाता


”मुहर लगेगी हाथी पे, वरना गोली चलेगी छाती पे” ! बुंदेलखंड के जंगलों-गांवों में ये “नारा” लगाने वाला खुंखार डाकू ददुआ का बेटा वीर सिंह इन दिनों चुनाव लड़ रहा.

ददुआ अब मारा जा चुका है. पिछले चुनाव में उसने दल बदल करके हाथी के बजाय साइकिल की सवारी शुरू की. साइकिल का टायर पंक्चर हुआ और माया की पुलिस ने ददुआ को मार गिराया.

तीन दशक तक ददुआ का आतंक और रोबिन्हुडगिरी चलती रही थी. अनेक किस्से-कहानियाँ सुनी जाती हैं उसकी. उसके बल पे अनेक लोग नेता बने, और नेता बनके
“डाकू” बने. यानि जनता को लूटने के काम किये. कम से कम दस विधान सभा सीटें ददुआ का “कार्य क्षेत्र" रहीं.

ददुआ ने अपना साम्राज्य बनाये रखने के लिए
“समाज सेवा” के अनेक काम किये, जो कि नेता से डाकू बने नेताओं-मंत्रियों ने नहीं किया. ये है बुनियादी फर्क जंगल के डाकू और नेता में.

ददुआ पुत्र ने देखा कि उसके पिता का नाम लेकर अनेक लोग नेता-मंत्री बन गए, तो वो क्यों नहीं. बदनामी के डर से किसी दल ने उसे टिकट देना नहीं चाहा तो वह सदल-बल चढ बैठा मुलायम के दफ्तर. आखिरकार उसे टिकट मिल ही गया. (कहां हो अखिलेश? आपने तो कहा था कि दागदार लोगों को आपके यहां टिकट नहीं मिलती !!) सपा वालों का कहना है कि वीर सिंह डाकू नहीं. उसे उसके पिता के अपराध की सज़ा क्यों मिले ? लेकिन, वीर पे भी अपहरण, हत्या, और फिरौती के कोई नौ मामले तो चल ही रहे हैं.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में अनेक उम्मीदवार कुछ इसी तरह के हैं. ऐसे में अकेले ददुआ -पुत्र को
“दोष” देना ठीक नहीं. सभी दलों में हैं अनेक ददुआ-पुत्र या खुद ददुआ.

ददुआ-पुत्र का कहना है कि वो नेता बनके समाज सेवा करेगा. गरीबों की भलाई के काम करेगा. अब्दी अच्छी बात. जो काम नेता से डाकू बने लोग नहीं कर सके, वो काम अगर डाकू-संतान और खुद भी एक अपराधी नेता बनके कर सके तो देश का कल्याण !! लेकिन...... ???? एक बड़ा सवालिया निशान..?

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

चेर्नबिल त्रासदी से नयी चेतना की उत्पत्ति

सम्पादकीय

चेर्नबिल त्रासदी से नयी चेतना की उत्पत्ति

किरण पटनायक

भारत में हुए भोपाल गैस काण्ड को हुए २५ साल से ज्यादा बीत चुके. उसके बाद भारत जैसे "पिछड़े" देश में भी एक नयी चेतना पैदा हुई. सरकारों में नहीं, राजनीतिक दलों में नहीं, बल्कि आम जन-गण में. इसीलिए आज देश के विभिन्न प्रान्तों में स्वतः स्फूर्त रूप से पर्यावरण की रक्षा, जंगल-झाड़ की रक्षा के अभियान-आन्दोलन चलने लगे हैं. बल्कि कहा जाय कि भोपाल गैस त्रासदी की घटना के पहले से ही प्रकृति बचाओ आंदोलनों की शुरुआत इस देश में हो चुकी थी, गैस काण्ड के बाद जिसमें गुणात्मक तेजी आयी.

जहाँ तक केंद्र सरकार सहित विभिन्न राज्य सरकारों की बात है
, तो ये आज भी ५० साल पुरानी और पिट चुकी "पश्चिमी नीति" की नक़ल करके खुद को बड़े प्रगतिशील समझ कर "देश के विकास" का राग अलाप रही हैं. इन्हें भोपाल गैस काण्ड और चेर्नबिल परमाणु त्रासदी के बाद भी होश नहीं आया है. विभिन्न राजनीतिक दल आज भी परमाणु ऊर्जा को अनिवार्य रूप से जरुरी बताकर देश सहित दुनिया का संकट बढाने में जुटे हुए हैं. इसके लिए खासकर कांग्रेस की साम्राज्यवाद-परस्त नीतियाँ ही जिम्मेवार हैं. अपने अस्थायी और सामयिक निजी स्वार्थ के लिए बड़े उद्योगपति और उनकी मीडिया इस विध्वंसकारी नीति में कांग्रेस सरकार का साथ दे रही है.

दिल्ली के कबाड़ से निकले जानलेवा रेडीएशन से देश की सरकार और दलों को सचेत हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे कि केंद्र सरकार को होश आया है. हर बड़े मामलों की तरह इस पर भी लीपापोती की जाने लगी है. जब इतने छोटे से रेडीएशन के एक्सपोजर से कई लोगों की जान जा सकती है या उन्हें जीवन-मरण की लड़ाई लडनी पड़ रही हो, तब चेर्नबिल या भोपाल जैसे कांडों के घटित होने की भयावहता को समझा ही जा सकता है. लेकिन अमेरिकी हाथों की कठपुतली मनमोहन सरकार से ऎसी किसी समझदारी की उम्मीद करना रेत से तेल की आशा करने जैसा ही है. जो सरकार अपने देशवासियों को अब तक यूनियन कार्बाइड और डाऊ जैसी अमेरिकी कंपनियों से उचित मुआवजा दिलाने में विफल साबित हो चुकी हो, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है.

यह सरकार तो इतनी घटिया और निर्मम है कि यह अब फिर से डाऊ (यूनियन कार्बाइड) को वापस लेन के लिए दाँव-पेंच में लगी हुई है. इतना ही नहीं, अमेरिका की यह दलाल सरकार अब इसकी गारंटी में भी लगी हुई है कि भोपाल या चेर्नबिल जैसी कोई बहुत भयंकर घटना घट जाय तो अमेरिकी- यूरोपीय कंपनियों को मुआवजा नहीं देना पड़े और उन पर मुकदमा भी न हो. इसीलिए पिछले दिनों संसद में परमाणु दायित्व विधेयक लाने का प्रयास किया गया था, मगर जोरदार विरोध की आशंका के मद्देनजर इसे फिलहाल गतालखाते में रख छोड़ा गया है. इसे ही कहते हैं देशद्रोह. सिर्फ माधुरी गुप्ता जैसे लोग ही देशद्रोही नहीं होते, बल्कि देश विकास के नाम पर देश की जनता के जीवन को खतरे में डालने वाली सरकार भी देशद्रोही हो सकती है. ऐसे देशद्रोहियों और जनता की दुश्मन सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए देश की आम जनता को एक नयी चेतना से लैस होना जरुरी है. जैसा कि चेर्नबिल काण्ड के बाद उक्रेन और सोवियत देशों सहित यूरोप में एक हद तक हुआ और हो रहा है.

२५-२६ अप्रैल 1986 की रात में चेर्नबिल काण्ड को हुए साल हो चुके. इस काण्ड ने पूरे यूरोप में एक नयी चेतना को जन्म दिया, विशेषकर "सोवियत" देशों में. राजनीतिक रूप से इस चेतना को किसी विचारधारा के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता. न साम्यवादी, न पूंजीवादी. यह शुद्ध रूप से पृथ्वी सहित मानवीय अस्तित्व की रक्षा से जुड़ी चेतना है.


यह और बात है कि इसका सरासर अनुचित इस्तेमाल करने में पूंजीवादी - साम्राज्यवादी शक्तियां जुट गयीं. इस वर्ग विभाजित विश्व में अगर किसी नयी चेतना के साथ वर्ग दृष्टिकोण न हो तो उसका नाजायज लाभ पूंजीवादी ताकतें उठाया करती हैं. इसे सोवियत यूनियन में देखा गया. इसका खामियाजा वहां के मजदूर वर्ग सहित दुनिया के मेहनतकश अवाम को भरना पड़ रहा है. उस नयी व शुद्ध चेतना का अनुचित लाभ उठा कर देश-दुनिया का शोषक वर्ग मेहनतकशों से उनके अधिकार छीनने के प्रयास में जुटा हुआ है, जो अधिकार अमेरिका के शिकागो में १ मई के रक्तरंजित युद्ध के बाद प्राप्त होना शुरू हुआ था.

मई दिवस के अवसर पर जनसमाचार भोपाल और चेर्नबिल काण्ड के
पीड़ितों के साथ अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए भारत सहित विश्व के आम लोगों का आह्वान करना चाहता है कि सरकारों की ऎसी हर कार्रवाई का पुरजोर विरोध किया जाय , जो आम जनता सहित पूरी मानवता और इस हमारी जननी पृथ्वी के लिए घातक हो. ऐसे अनेक आन्दोलन देश के विभिन्न क्षेत्रों में चल भी रहे हैं. इन्हें और भी आगे बढ़ाकर सचेत रूप से वर्ग दृष्टिकोण के तहत ऐक्यबद्ध करना जरुरी है। इसे राजनीतिक सिद्धांतों के घेरे में बांधना भी उचित नहीं। क्योंकि , जैसा कि पहले ही कहा गया है, यह मानवता और पृथ्वी की रक्षा का आन्दोलन है.

बहरहाल, सोवियत संघ सहित यूरोप में २७ अप्रैल तक किसीको इसका पता ही नहीं था कि चेर्नबिल के चौथे रिएक्टर में हुए विस्फोट के कारण नागासाकी-हिरोशिमा से चार सौ गुना अधिक सेजियम-१३७, स्ट्रेंसीयम-९० और अन्यान्य पदार्थो से रेडियोधर्मिता वातावरण में फैलती जा रही है. चेर्नबिल पूर्व सोवियत देश उक्रेन में है. राजधानी किएव से मात्र १३५ कि.मी. दूर. यह "दुर्घटना" रासायनिक थी, नाभिकीय नहीं. नाभिकीय होती तो न जाने क्या होता?

इसका असर स्पेन को छोड़ कर लगभग पूरे यूरोप में इसका दुष्प्रभाव पड़ा. उक्रेन और पूर्व यूरोप के वरिष्ठ पर्यावरण नेता विटाली कनोनौव के अनुसार "२५ अप्रैल की रात वहां ३६० लोग कार्यरत थे. उनमे से अब कोई नहीं बचा. कोई उसी समय मारे गये तो एनी कुछ महीनों बाद. वहां के कर्मचारियों के परिवारों को प्रिपीयात शहर से बाहर ले जाते समय अधिकारियों ने कहा था कि ज्यादा सामान ले जाने की जरुरत नहीं, क्योंकि जल्द ही वापस आजाना है. यह झूठ नहीं कहने से अच्छा होता. आम लोगों को संकट की भयावहता के बारे में बताना जरुरी था. " वे सभी दस साल बाद १९९६ में ही वापस आ सके , जो बचे रह गये थे.

राष्ट्र संघ के चेर्नबिल फोरम के अनुसार २८ अग्निशमन कर्मचारियों के अलावा ६०० लोगों की मृत्यु उसी समय हो गयी थी. इसके बाद भी इस दुर्घटना से लोगों का मरना जारी रहा. छः लाख से ज्यादा लोगों पर रेडिएशन का दुष्प्रभाव पडा. कम से कम चार हजार लोगों की मृत्यु थायरायड कैंसर से हुई और हो सकती है. लोगों के दिमाग और मानसिकता पर चेर्नबिल का बहुत ही गभीर प्रभाव पड़ा. इससे एक नयी चेतना का विकास आरम्भ हुआ. विटाली कनोनौव के इस मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से अनेक लोग सहमत नहीं होने के बावजूद यह बड़े हद तक सच है. क्योंकि इसके बाद से ही यूरोप में पर्यावरण आन्दोलन का आरम्भ हुआ, जिसे वहां ग्रीन आन्दोलन कहा जाता है.

इतना ही
नहीं, इसके बाद से सोवियत संघ के पतन की भी शुरुआत हुई. उसके पतन के और भी कई प्रमुख कारण हैं, जिन पर काफी चर्चा हो चुकी है और आगे भी होगी, मगर कनोनौव के विश्लेषण को भी नकारा नहीं जा सकता. यहाँ इस बहस का प्रारम्भ करना प्रासंगिक होगा कि “सोवियत संघ ने मानवता और इस सृष्टि की रक्षा में खुद की बलि चढ़ा दी”. यह काम अमेरिका जैसा कोई साम्राज्यवादी-पूंजीवादी देश नहीं कर सकता. हालाँकि सोवियत संघ के पतन के अन्य राजनीतिक-आर्थिक कारण भी हैं. फिलहाल, यह अलग लम्बी बहस का मुद्दा है.

विटाली कनोनौव कहते हैं कि "तबसे ही हमारे यहाँ सब्ज आन्दोलन शुरू हुआ. उससे विभिन्न संस्थाओं का जन्म हुआ, कम्युनिष्ट पार्टी के साथ मिल-जुल कर. लोगों के बहुत करीब जाकर हमने काम किये. यह काम अनेक दिनों से नहीं हो रहा था. सत्ता में रहते-रहते ऐय्याशी बढ़ गयी थी. सही काम नहीं हो रहा था. लोगों को आतंकित किया जा रहा था. इसीलिए नयी चेतना का उदय हुआ. इस चेतना की उदगम वही चेर्नबिल है. "

लेकिन कम्युनिष्ट होते हुए भी कनोनौव एक बात भूल गये कि वर्ग नजरिये के बिना कोई भी नयी चेतना अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती. इसी कारण उस नयी चेतना का इस्तेमाल करके साम्राज्यवादी देश पूर्व सोवियत देशों सहित विश्व में अपना एजेंडा लागू करने के षड्यंत्र में व्यस्त हैं. ग्लोबल वार्मिंग के मामले में भी ये देश अपने स्वार्थों को सर्वोपरी रख कर अपनी मनमानी चलाने के प्रयास में लगे हुए हैं.


इसीलिए कनोनौव भी स्वीकार करते हैं कि ”यूरोप की संसदों में सब्ज आन्दोलन के प्रतिनिधियों की भरमार के बावजूद अमेरिका-यूरोप सहित अन्य पूंजीवादी देशों को होश नहीं आया है. इसीलिए भी इतनी बड़ी दुर्घटना के बावजूद चेर्नबिल संयंत्र को बंद करते चार-पांच साल लग गये थे. उनके अनुसार अभी भी कोयला-गैस या फौसिल फ्युएल की तुलना में परमाणु ऊर्जा को कहीं अधिक सुरक्षित माना जा रहा है, यह सच नहीं है, चेर्नबिल से सबक लेनी चाहिए.” भारत की सरकार तो ऎसी कोई सबक लेने से रही, लेकिन आम लोग अगर इससे सबक ले लें तो वे ऎसी मानवता-विरोधी सरकारों को सबक जरुर सीखा सकते हैं. .(समाप्त)

रविवार, 22 जनवरी 2012

अपने ही बच्चों की जान के दुश्मन न बनें

बचपन को बचपन - जिंदगी को जिंदगी रहने दें
रेस का घोडा न बनाएँ

विशेष संवाददाता


विपिन के पिता रेलवे में हैं। मां घरेलू महिला। विपिन दो भाइयों में बड़ा है और अगले साल उसको ज्वाइंट एंट्रेंस की परीक्षा देनी है। छोटा भाई नरेंद्रपुर रामकृष्ण मिशन बोर्डिंग स्कूल में है। विपिन की सबसे बड़ी समस्या खुद उसके पिता ही हैं। वह साफ-साफ कहता है कि पिता के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं हैं। क्यों? जब वह अच्छे नंबर लाता है तो पिता उसके साथ बहुत अच्छा सलूक करते हैं। लेकिन पहले की अपेक्षा जरा भी कम नंबर लाने से पिता का व्यवहार किसी दुश्मन जैसा हो जाता है। एसएससी परीक्षा में 90 फीसदी नंबर लाकर विपिन फर्स्ट आया था। तब पिता की आंखों का तारा बन गया। लेकिन हायर सेकेंड्री में वह इतना अच्छा न कर पाया। और तबसे पिता के साथ उसकी एक दूरी बन गयी। उसका कहना है कि वैसे भी उसके पिता स्वभाव से बहुत ही चिड़चिड़े किस्म के इंसान हैं। मां के साथ भी उनका बहुत अच्छा व्यवहार नहीं है।

विपिन बताता है कि बचपन से ही उसके पिता उसे पढ़ाते रहे हैं। और पढ़ाने के दौरान वे अक्सर मार-पीट किया करते रहे। परीक्षा में एक नंबर के प्रश्न का उत्तर भी गलत लिख कर आने पर अच्छी-खासी धुलाई होती। और इस पर अगर मां बीच-बचाव करती तो उन्हें भी खरी-खोटी और अपमानजनक बाते सुननी पड़ती। इतना ही नहीं, विपिन के पिता की सोच अन्य अनेक पिताओं से बिल्कुल अलग है। बचपन से ही उन्होंने अपने बच्चों को सिर्फ टीवी से ही नहीं, नाच-गाना, खेल-कूद; यहां तक कि कहानी की किताबों तक से भी दूर रखा। उनका मानना है कि इन सबसे समय नष्ट होता है। ऐसे में विपिन मां को अपने बहुत करीब पाता है। मां से उसका रिश्ता दोस्ताना है। मां विपिन से कहती है कि डॉक्टरी में चांस लेकर वह हॉस्टल चला जाए। ताकि शांति से पढ़ाई-लिखाई कर सके। इसीलिए विपिन एंट्रेंस के लिए जी-जान लगाकर तैयारी कर रहा है।

यह तो हुई विपिन की बात। आइए अब देखते हैं रोहन की समस्या। बचपन से ही रोहन पढ़ाई-लिखाई में बहुत ही अच्छा है। माता‍-पिता के साथ भी उसका संबंध बहुत अच्छा रहा है। 2007 में एसएससी की परीक्षा में 94 फीसदी नंबर लाकर दक्षिण दिनाजपुर जिले में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इसके बाद गांव से वह कोलकाता चला आया। यहां हायर सेकेंड्री में वह प्रथम नहीं आ पाया। उसके नंबर महज 85 फीसदी रहे। रोहन की समस्या है कि 85 फीसदी नंबर लाने के बावजूद आज माता-पिता, पड़ोसी और यहां तक कि स्कूल के शिक्षक भी उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। उसे फिकरे सुनने पड़ते हैं। और यह उसे किसी भी कीमत में बर्दास्त नहीं हो रहा है।

आगे की पढ़ाई के लिए पहले तो कोलकाता के एक कॉलेज में उसने दाखिला लिया। लेकिन पारिवारिक दवाब के कारण उस कॉलेज को छोड़कर हुगली जिला के एक गैर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में दोबारा दाखिला लेना पड़ा। उसके माता‍-पिता का मानना है कि इंजीनियरिंग ही एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें मोटी रकम कमाने की गुंजाइश है। जबकि वह आईएएस बनना चाहता था। अब कुंठित मन से वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो कर रहा है। लेकिन जीवन के प्रति उसके मन में वितृष्णा भर गयी है। मायूसी भरे क्षण में बार-बार रोहन यही कहता रहता है कि अब उसकी जिंदगी में कुछ रस नहीं है। सब कुछ खत्म हो गया। जीने का कोई मतलब नहीं रहा।

आजकल की नौजवान पीढ़ी को ऐसे ही या इसी तरह की समस्या से अक्सर दो-चार होना पड़ता है। माता-पिता बच्चों पर अपने सपने लाद रहे हैं। कुछ माता-पिता की नजरों में बच्चे किसी विनिवेश से कम नहीं हैं। यानि कितना पैसा लगाया और कितना मिलेगा – जैसी सोच हावी हो गयी है। कहने की जरूरत नहीं कि बच्चों के साथ यह सरासर अन्याय है। बच्चों के साथ घरेलू हिंसा आज आम है, फिर वह शारीरिक हो या मानसिक। और यह सब बाल अधिकारों का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जो लोग हिंसा कर रहे हैं वे उनके बेहद करीबी लोगों में से हैं।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान बच्चों-किशोरों का ही होता है। उनके मन में नकारात्मक भावना घर कर जाती है। और कभी-कभी इसका असर कुछ इस तरह होता है कि उनके मन में जीवन से मुंह मोड़ने की भावना पैदा होने लगती है। यही कारण है कि आजकल युवाओं में आत्महत्या की वारदातें बढ़ रही है। और शिक्षा को लेकर चूहा दौड़ का ऐसा दौर शुरू हो चुका है कि युवा पीढ़ी पर हर जगह अव्वल होने का दबाव बढ़ता ही चला जा रहा है। और चिंता का विषय है कि यह दबाव उनके माता-पिता की ओर से पड़ रहा है। हरेक माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका बच्चा शीर्ष स्थान पर हो। लेकिन जहां तक दिमागी संरचना का सवाल है हर किसीका दिमाग एक-सा नहीं होता। प्रतिभा हर किसीमें होती है। लेकिन जरूरी नहीं कि वह प्रतिभा तथाकथित रूप से किसी विषय विशेष ‍शिक्षा से ही जुड़ी हो। ऐसे में अधिक दबाव न सह पाने की स्थिति में युवा जीवन से विमुख होने को मजबूर हो रहे हैं।

कम उम्र के युवाओं व किशोरों की अकाल मृत्यु के दस कारणों में से एक आत्महत्या ही हुआ करती है। यही नहीं, युवाओं की बात अगर जाने भी दें तो समाज में चल रही भयंकर प्रतिस्पर्धा ही वह विडंबना है कि आठ-नौ साल के छोटे बच्चे भी परीक्षा के खराब नतीजे के कारण आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। जाहिर है इसके लिए माता-पिता ही मुख्य रूप से दोषी हैं। विपिन और रोहन के मामले में भी यही बात साबित होती है। इन दोनों पर भी अच्छे नतीजे के लिए इस तरह दबाव बनाया गया कि रिश्ते पर आंच आ गयी है। और जीवन बेरस होता जा रहा है।

मनोचिकित्सक रीमा मुखर्जी का कहना है कि माता-पिता बच्चों के लिए मानसिक-भावनात्मक खुराक का काम करते हैं, इसीलिए बच्चे उनसे अच्छे दोस्त और हमदर्द होने की अपेक्षा रखते हैं। लेकिन “आधुनिक” माता-पिता अपने ही बच्चों के जान के दुश्मन बनते जा रहे हैं। यही माता-पिता है जो बच्चों में अव्यावहारिक महत्वाकांक्षा की भावना जगाते हैं। महत्वाकांक्षा और उच्चाकांक्षा में फर्क करना जरूरी है। अपनी उच्चाकांक्षा बच्चों पर नहीं लादनी चाहिए, कि उनका नौनिहाल जीवन से नाता तोड़ने की सोचने लग जाए।

जुवेनाइल वेलफेयर बोर्ड के मनोचिकित्सक हिरण्मय साहा का कहना है कि ज्यादातर मामलों में किशोरों और युवाओं की असली समस्या उनके घरों से ही शुरू होती है। अभिभावक व माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता जाने बिना उनसे कुछ अधिक अपेक्षाएं कर लेते हैं। किसी सूदखोर या मुनाफाखोर साहूकार की तरह नफा-नुकसान का हिसाब लगाने लग जाते हैं। जैसा कि विपिन और रोहन के मामले में देखने में आया। बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च या मेहनत किया और बदले में कितने नबंर आए?

रीमा मुखर्जी कहती हैं कि परीक्षा के नतीजे के आधार पर अगर परिवार का प्रेम निर्भर करता है तो इससे बड़ी हताशा की बात और क्या हो सकती है? माता-पिता व परिवार का दूसरा नाम ही आत्मीयता और सहयोग है। और यह बच्चों को मिलना ही चाहिए, लेकिन खेद का विषय यह है कि यह मिल नहीं पा रहा है। माता-पिता के प्रेम में मिलावट आ गयी है, वे बच्चों की शिक्षा के मद में किए गए खर्च को निवेश के रूप में देखने लगे हैं।

हिरण्मय इन सबके लिए शिक्षा पद्धति को भी जिम्मेवार ठहराते हुए कहते हैं कि किसी भी बोर्ड की परीक्षा का नतीजा आने के साथ मेरिट लिस्ट और टॉप टेन को लेकर इतना हंगामा मचता है कि अगले साल परीक्षा देनेवालों पर अपने आप दबाव बढ़ता चला जाता है। हाल ही में बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रेड दिए जाने की घोषणा की गयी, लेकिन हमारी सोच ऐसी हो गयी है कि वहां भी ग्रेड को लेकर हंगामा मचना निश्चित है। शिक्षा का मकसद नित नयी चुनौतियों के लिए बच्चों तैयार करना है, न कि आपसी प्रतिस्पर्धा में सिर-फुटौव्वल के लिए और हताशा-निराशा को बढ़ावा देने के लिए।

इस सिलसिले में कुछ समाजविज्ञानियों की राय है कि फिल्म ‘तारे जमीन पर’ को माता-पिता, अभिभावक और शिक्षक-शिक्षिकाएं अवश्य देखें। यह फिल्म बच्चों के लिए नहीं; बल्कि अभिभावकों के लिए है। (समाप्त)

शनिवार, 21 जनवरी 2012

हिंदी के साथ ये अन्याय क्यों?

हिंदी के लिए सुसमाचार

राष्ट्र भाषा के नाते हिंदी को इसका सम्मान कब का मिल जाना चाहिए था जो कि अब तक नहीं मिला। हिंदी को तमाम राज्यों में अनिवार्य विषय बना दिया जाना चाहिए था, मगर यह अब तक नहीं हो पाया। कई गैर हिंदी राज्यों में एक वैकल्पिक विषय के रूप में यह पढ़ाई जाती है, जबकि लादी गयी साम्राज्यवादी अंग्रेजी ज्यादातर राज्यों में अनिवार्य है। और तो और, हिंदी भाषी राज्यों में इसकी उपेक्षा की जा रही है। हिंदी के बजाए अंग्रेजी को तरजीह देने की प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ रही है। अनेक शिक्षा संस्थानों में हिंदी को दूसरी भाषा का दर्जा प्राप्त है। लेकिन अंग्रेजी को प्रथम स्थान। यह हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं के साथ भीतरघात है। यह भीतरघात सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर हो रहा है. ऐसे में जरूरी है कि आमलोग जागरूक बने। अपनी सदियों पुरानी राष्ट्रीयता को पहचाने और हिंदी भाषा की अस्मिता और भारतीय राष्ट्रीयता के लिए आगे आए, और अंग्रेजी के बढूते वर्चस्व को समाप्त कर राष्ट्र भाषा को स्थापित करे।

बहरहाल, इस अंधकार में असम से आशा की एक किरण आती दिख रही है। हिंदी को अनिवार्य शिक्षा बनाने की दिशा में बढ़ रहा है असम। वहां के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने दसवीं की परीक्षा में हिंदी को अनिवार्य करने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। बोर्ड सचिव डी. महंत के अनुसार, ‘भारत में विभिन्न प्रकार की स्थितियों का सामना करने के लिए हिंदी जानना जरूरी है।‘

प्रस्ताव अभी आया भी नहीं था कि असम, बंगाल के मुट्ठी भर लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। ये चंद लोग शुरूआत से ही अंग्रेजों और अंग्रेजी के भक्त रहे हैं। ऐसे ही एक अंग्रेजी भक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इंग्लैंड में जाकर पिछले दिनों भारत में ब्रिटिश शासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। ऐसे ही गुलाम मानसिकता के लोगों ने ही आजादी प्राप्ति के पहले से ही हिंदी का हौवा खड़ा करना शुरू कर दिया था। अंग्रेज सांप्रदायिक भेदभाव के साथ-साथ भाषाई भेदभाव को भी बढ़ावा देने में लगे रहे। अब भी अंग्रेजों, अमेरिकियों और अंग्रेजी के भक्तों ने भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाते रहने की नीति जारी रखा हुआ है। यह और बात है कि बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल, आंध्र, महाराष्ट्र, मणिपुर, गुजरात, मेघालय आदि के करोड़ों आमलोग अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी को ही पसंद किया करते हैं। स्थानीय या प्रांतीय भाषा की रक्षा के नाम पर अहिंदी भाषी राज्यों में बहुत दिनों से राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं, मगर सच्चाई यह है कि उन तमाम राज्यों की मातृ भाषाओं की घोर उपेक्षा करते हूए साम्राज्यवादी अंग्रेजी को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। असमिया, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, कन्नड भाषा जाननेवालों को अच्छी-बड़ी नौकरी नहीं मिल पाती। जबकि सिर्फ अंग्रेजी जाननेवालों को बड़े से बड़े पद पर बिठा दिया जाता है। दरअसल, हिंदी का हौआ अंग्रेजी के गुलामों ने ही खड़ा किया है, और इसीके जरिए वे लोग विभिन्न राज्यों सहित भारत के उच्चपदों पर कब्जा जमाये हुए बैठे हैं। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण ही प्रांतीय भाषाओं और भाषा-भाषियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। बंगालियों और तमिलों को इस पर गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।

बहरहाल, तमाम विरोधों को बावजूद असम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का मानना है कि असमियों की बहुमुखी तरक्की के लिए हिंदी सीखना अनिवार्य रूप से जरूरी है। बोर्ड सचिव डी. महंत कहते हैं कि फिलहाल, हिंदी पांचवीं कक्षा से सातवीं तक पढ़ाई जाती है। मगर अधिकांश विद्यार्थी इसे सतही ढंक से ही पढ़ते हैं। ऐसे में जब वे राज्य से बाहर जाते हैं तब उन्हें बड़ी दिक्कत पेश आती है। इसीलिए पांचवीं से दसवीं तक हिंदी पढ़ना और उसमें उत्तीर्ण होना अनिवार्य किए जाने का प्रस्ताव है। यहां प्रसंगवश इसका उल्लेख किया जा रहा है कि बंगाल और ‍तमिलनाडु ने हिंदी का विरोध करनेवाले कुछ लोग जब कभी चेन्नई, मुंबई, कोलकाता या दिल्ली जाते हैं तब अकसर हिंदी को अनिवार्य रूप से जरूरी करार देते हैं। बल्कि प्रणय रॉय जैसे अंग्रेजीदां जो हिंदी का एक शब्द भी बोलना अपना अपमान समझते हैं, भी जब दक्षिणी राज्यों में जाते हैं, तब वे भी हिंदी की अनिवार्यता महसूस करने लगते हैं।

इसी बात को असम शिक्षा बोर्ड ने भी महसूस किया और इसे व्यापक समर्थन भी मिल रहा है। सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के एक प्राचार्य पवित्र कुमार डेका, डिब्रुगढ़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति कमलेश्वर बोरा ने इस प्रसताव का स्वागत किया है। असम के नौजवानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी हिंदी लिखना, पढ़ना और बोलना चाह रहा है। अनेक विद्यार्थी चाहते हैं कि जल्द से जल्द हिंदी की अनिवार्य पढ़ाई-लिखाई शुरू हो।

तमिलनाडु, आंध्र, करेल, मिजोरम, मेघालय आदि राज्यों में भी हिंदी की पढ़ाई की और आमलोगों का झुकाव देखा जा रहा है। यह एक अच्छी खबर है। मगर अफसोस की बात यह है कि हिंदी भाषी राज्य हिंदी की उपेक्षा कर अंग्रेजी को बढ़ावा देने में लेग हुए हैं। कम से कम हिंदी भाषी राज्यों से अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई खत्म कर दी जाए, और बांग्ला, उडि़या, तेलगु, असमिया, मराठी गुजराती, तमिल आदि एक-एक भाषा को अपना लिया जाए तो निश्चत तौर पर इसका प्रभाव अहिंदी भाषी राज्यों पर पड़ेगा। और, हिंदी को वे तहेदिल से राष्ट्र भाषा के रूप में अपना लेंगे। (समाप्त)

सोमवार, 28 नवंबर 2011

आज 'भगवान "अल्लाह "जीसस " भी लाचार है . ....

तो पहला काम .-- ख़ुद को जगाना

कितना मुश्किल है खुद को बताना
कि हम एक हैं ...
और मानव धर्म एक है .....
और
सारे भारतीय ।मेरे भाई बहन हैं ...

ये प्रतिज्ञा सिर्फ
पाठशाला का एक नियम बनाना .....

नर्सरी में दाखिला लिया ..
पापा फॉर्म भर रहे थे ..
.

पहला सवाल था .
जाति , धर्म कौन सा ?
हिन्दू ....लिंगायत .......

पापा ...ये धर्म क्या होता है ..?
मेरा सवाल था ...
.

बेटा ..तुम नहीं समझोगी ..
बहुत छोटी हो .....

"आया " ने मेरी ऊँगली थामा ....
आया से मैंने पूछा .....आपका धर्म क्या है . ....?
मुस्लिम ............

ये था पहला पाठ मेरे बचपन का .....
कितना आसान हो गया है ....
खुद को बताना ...


मेरे दादा ..मेरे दादा के दादा ..उनके दादा के दादा
सभी ने यही सीखा था ..
हम सब एक है ...
मानव धर्म एक है ...


कोई तो मेरे सवालो का जवाब दो ..........?
'रामायण कहा से आया ..?
कुरान कहा से आया ..?
महाभारत कहा से आया ....?
और ये बायबिल ॥कहा से आयी ...?


कितना आसान हो गया है ..खुद को बताना
आज 'भगवान "अल्लाह "जीसस " भी लाचार है . ....
उनके नाम पर ही ॥एक दूसरे को मरोड़ रहे हैं ....

कैंडल भी बहुत जलाए ......
टी वी पर नाम भी फैलाये ....
कि ..हम लड़ेगे ....हम लड़ेगे .....
दूसरी सुबह ने देखा ...
वो खुद ही लड़ रहे है .....


मै "मारता "...तू मुस्लिम ....वो बिहारी .....
आसान हो गया है खुदको बताना

सिर्फ "दिल " से सोचो ....
"भारत मेरा देश है ...
और "भारत मेरा घर है "...
..... हम सब भाई बहन है ...

तो कैंडल भी न हो ...
लिस्ट भी न हो
ख़ुद को जगाओ .......
ख़ुद को जगाओ ..
....

तो आसान नहीं होगा ख़ुद को जगाना ......
तो ...पहला काम ..
ख़ुद को जगाना ......
ख़ुद को जगाना ......






नंदिनी पाटिल

क्षमा करें गाँधी हमें ....

गाँधी की आखे मुझे घूर रही थी ...
जब मै नए सदी का हवाला दे रही थी.....

किताब बंद किया अपने नए विचारो और आखो के साथ ...
विचार मेरे गुलाम है ,नए सदी के हाथ .....

नए सदी का पाठ है - आतंकवाद का ...
चरखा यहाँ चलता है,घोटाले घोटालो का.....

धूर्तता की जीत है ,नैतिकता की हार ,
लाचारी की चमडी है ,करो जयजयकार....


सत्ता की है आरती यहाँ, पूजा है कुर्सी की....
प्रसाद है पैसोका , आशीर्वाद मोर्चे , हड़तालों की....


पंडित मुल्ला दो हथियार यहाँ, पाठ यहाँ पर दंगल का......
चरखा यहाँ चलता है , घोटाले घोटालो का.......


कदम चूमती जीत यहाँ ,नई सदी के ..कौरवों की ....
इज्ज़त यहाँ लुटती है, मूल्य और मर्यादा की .....


नई सदी में चिंतन है, शपथ कैसे ले झूठ की ...
नई सदी में मनन है, प्रतिज्ञा कैसे ले फूट की ..


शिकवा करे किससे ? जब बाड़ खाए खेत को ...
आज़ाद भारत में रोज देखते ज़िंदा लाश, ज़िंदा मौत को ...


क्षमा करें गाँधी हमें ....
नई सदी में इंतज़ार है आपका ...
चरखा यहाँ चल रहा है घोटाले- घोटालो का..


-- नंदिनी पाटिल