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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

महिला उत्पीडन विरोधी किसी गंभीर आंदोलन के लिए महिलाएं खुद कितनी तैयार!!



महिलाओं को 'देवी' बनने का बड़ा शौक है तो दुर्गा बनो, काली बनो. और, सारे बलात्कारियों के संहार के लिए आगे आओ.


जब तक "देवी" बनकर अपनी रक्षा न करें महिलाएं-लडकियां, तब तक वे बस पूजा करने-करवाने के ही लायक! मंदिरों की शो-पीस 
देवी!! 


महिलाओं पे हो रहे अत्याचार के लिए अनेक महिलाएं खुद भी जिम्मेवार. वे भी चाहती हैं कि उन्हें इस ज़ुल्म-बेबसी से बाहर निकालने कोई 'देवदूत' आये !!

इस नेट पे बैठीं महिलाओं के सात दिन के ट्विट देख लिए जाएँ. तो पता चल जाएगा कि वे महिला उत्पीडन विरोधी किसी गंभीर आंदोलन के लिए कितनी तैयार!!

इस नेट मीडिया में बहुत ही कम ऐसी महिलाएं हैं, जो महिला विरोधी मर्द सत्तात्मक व्यवस्था की सोच को खंडित कर रही हों.

पिता-पति-भाई-पुत्र की कमाई से आराम की जिंदगी जी रहीं यहां की कोई आधी महिलाओं को हाय-हेलो, चैटिंग, चोंचलेबाजी, घटियाराजनीति से फुर्सत नहीं!!
नेट मीडिया को पढ़े-लिखों का संसार भी माना जाता. जब यहां की तथाकथित "पढ़ी-लिखी" महिलाएं मर्दाना समाज की घटिया सोच को आगे बढ़ा रहीं हों तो...बाकी "अनपढों" से क्या उम्मीद की जाय!!
ये "पढ़ी-लिखी" महिलाएं ज्यादातर खुद को "मर्द" बनाने में ही जुटी दिख रहीं. जबकि "मर्द समाज" ने ही इनकी दुर्दशा कर रखी है!!
मर्दों की नक़ल करने के बजाय "मर्दों" के होश ठिकाने लगाने के काम जब तक ये "पढ़ी-लिखी" महिलाएं शुरू नहीं करतीं, महिला उत्पीडन जारी रहेगा.

महिलाओं को जातिवाद-धर्मवाद-दलवाद के चंगुल से बाहर आकर खुद की सुरक्षा, मर्यादा, सम्मान, स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होना ही पड़ेगा.

कोई “देवदूत” आसमान से नहीं उतरने वाला. उन्हें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी. वे जान लें. और, महिलाओं को एकजुट करने के काम शुरू करें.

महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समितियां बनाने के काम में महिलाएं खुद आगे आएं. वरना, वे मर्दों-दलों-जातियों-धर्मों की गुलामी खटती रहेंगी.

सभी दलों में मोटे तौर पर “मर्दों” या मर्दाना सोच वाली महिलाओं का ही कब्जा. इसीलिए ये दल महिलाओं की समस्याओं के बुनियादी समाधान में अक्षम.









सोमवार, 22 अप्रैल 2013

दामिनी आंदोलन है क्या? क्या कोई दलीय प्रतिनिधि बता सकते?


कल मुख्य  रूप से मैंने तीन मुद्दों को उठाया. सुबह के वक्त महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति की भूमिका. जिसे अनेक जगह प्रसारित भी किया गया. अनेक लोगों ने फेसबुक और ट्विटर में इसके साथ सहमती भी जाहिर की और अपने विचार भी रखे. आशा है कि इस मुद्दे पे यहां जो अलग से ब्लॉग है, वहां भी सभी साथी अपने सुझाव-विचार ज़रूर ही रखते जाएंगे. ये सुझाव आगे काफी काम के साबित होने वाले. कल ही मैंने पुलिस व्यवस्था में बुनियादी सुझाव, जनतांत्रिक बदलाव की चर्चा शुरू करने का प्रयास किया, मगर दिल्ली में बलात्कार विरोधी आंदोलन पे पुलिस कार्रवाई हो जाने से अफरा-तफरी में अनेक साथी इस चर्चा में भाग नहीं ले पाए. वे सभी साथी इस ब्लॉग के जरिए चर्चा करें. अपने सुझाव दें. कल ही रात में मैंने दामिनी आंदोलन के चरित्र से जुड़े विन्दुओं को उठाने की कोशिश की. उसपे भी खास चर्चा संभव नहीं हो पायी. कुछ साथी ज़रूर चर्चा में शामिल हुए. लेकिन, इसपे भी व्यापक-विस्तृत चर्चा की सख्त ज़रूरत है... सो, इस ब्लॉग में सभी अपने विचार रखे. चर्चा करें, तो अच्छा हो. ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- दामिनी के वक्त यह आंदोलन शुद्ध रूप से आम जनता का अपना आन्दोलन था, जिसमें महिलाओं का नेतृत्व स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आया. इस बार? इस बार दामिनी आंदोलन लगभग पूरी तरह राजनीतिक रूप ले चुका. ये अच्छा हुआ या बुरा या बीच-बीच का, इसपे बाद में अनेक विश्लेषण आते रहेंगे. मगर.. ..मगर, इस बार महिलाओं के हाथ से लगभग नेतृत्व निकल चुका दिख रहा. ये और बात कि कुछ महिला संगठन भी मैदान में. उनमें भी कुछ दलीय. दामिनी आंदोलन है क्या? क्या कोई दलीय प्रतिनिधि बता सकते?
जिन्हें दामिनी आंदोलन के चरित्र का पता नहीं; वे संसद से लेकर सड़कों तक जितना शोर मचा लें, दामिनी नहीं बचाई जा सकती! दामिनी आंदोलन राजनीतिक से कहीं अधिक सामाजिक मुद्दा.इस मुद्दे पे चुनावी राजनीति करना दामिनियों के साथ खिलवाड़ ही होगा.अधकचरे नेता जान लें. विभिन्न दलों ने विभिन्न तबकों के जनसंगठनों को अपना "गुलाम" बना रखा. उनके जरिए अपनी दलीय राजनीति चलाई.इससे उन तबकों के हितों का नुकसान हुआ. विभिन्न तबकों के हित एक जैसे होने के साथ-साथ अलग-अलग भी. ऐसे में उन तबकों के संगठनों को पूरी स्वतंत्रता या व्यापक स्वायतता देनी ज़रुरी. यही बात दामिनी आन्दोलन पे भी लागू. बल्कि कहीं ज्यादा लागू होती. दामिनी आंदोलन का नेतृत्व आम महिलाओं के हाथ हो. न कि दलीय नेताओं के हाथ. दामिनियों का दर्द दामिनियाँ ही बहुत बेहतर जान सकतीं. जिसे दलों के मर्द नेता या मरदाना समाज के दबाव में जी रहीं महिला नेता नहीं समझ सकतीं. इस ट्विट श्रृंखला में सबसे पहले जवाब देने वाले महाशय ने ये प्रतिक्रिया दी : (हालांकि वे अंतिम बात कर रहे थे. उसके बाद उन्होंने शायद कुछ वक्त के लिए ट्विटर छोड़ दिया ..... 

I am trying to quit twitter and glad that mine last few tweets may be with you :) ( Till twitter drags me back).)
what do you mean ? It is being lead by politically oriented people ? So what !!
मेरे इससे पहले के आज के और इस ट्विट के बाद के सारे ट्वीट्स देखें. फिर कोई सवाल करें. बल्कि कुछ सवालों के जवाब भी दें.
I read them and sort of agree
(इसके बाद लंबी बात चली. वे मोटे तौर पे इन सारे मुद्दों से सहमत ही दिखे. इस लिंक में हमारी बातचीत देखी जा सकती. https://twitter.com/Hello_AAP) https://twitter.com/Hello_AAP/status/326062925112541186 बहरहाल, सभी साथियों के लिए यह चर्चा फिर से जारी कर रहा. इस सिलसिले के तीनों ब्लॉग देखें. सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए.


शनिवार, 20 अप्रैल 2013

बलात्कार सहित महिला उत्पीडन के खिलाफ मुहल्ला स्तर पे काम हों 
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इन समितियों का नेतृत्व महिलाओं के हाथ में ही हों
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* देशव्यापी बलात्कार विरोधी आंदोलन के साथ-साथ शहरों-गांवों में मुहल्ला समितियां गठित की जाएँ. जो महिला उत्पीडन-बलात्कार के खिलाफ मुहिम चलाये.

*महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति न सिर्फ बलात्कार के खिलाफ जागरण चलाये, बल्कि घरों के अंदर महिलाओं के प्रति अमानवीय बर्ताव पे भी नज़र रखे..

*महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति में हर तबके के नागरिक हों. उसका नेतृत्व भी हर तबके के हाथ हो. उसमें महिलाएं अग्रणी  भूमिका निभाएं.

*महिला उत्पीडन मुहल्ला समिति शुद्ध रूप से आम जनता की हो. सभी दलीय-निर्दलीय नागरिक अनिवार्य रूप से शामिल हों, तो ये एक मिसाल बन जाएगी.

*महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति लड़कों-पुरुषों की "बलात्कारी मानसिकता" को खत्म करने के लिए "नैतिक शिक्षा" के काम भी करे.

*बंगाल के गांवों में जब चोरी-डकैती बहुत बढ़ गयी थी, तब ऐसी मुहल्ला समितियां रात में चौकीदारी किया करती थीं. महिला मुद्दा तो और भी गंभीर बात.

*दलों-संगठनों व महिला संगठनों को महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति बनाने केलिए आगे आना चाहिए.इससे बलात्कार सहित महिला उत्पीडन पे रोक लगेगी..

*बलात्कार व अन्य प्रकार के अमानवीय महिला उत्पीडन के प्रति पुलिस-सरकारों की "मर्दाना सोच" को भी इन मुहल्ला समितियों के जरिए बदला जा सकेगा.

*महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति किसी भी प्रकार की सरकारी-दलीय सहायता के ही चले. इसे आम जनता अपनी पहल और खर्च पे चलाये.

*महिला उत्पीडन विरोधी मुहल्ला समिति का नेतृत्व मुख रूप से सुलझी हुई महिलाओं के हाथ ही हो. वो महिला झुग्गी-झोपड़ी की भी हो सकती हैं.

* जो लोग-दल-संगठन ईमानदारी से बलात्कार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, वे महिला उत्पीडन विरोधी

 मुहल्ला समिति बनाने की पहल लेना शुरू करें.



शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

अरविन्द केजरीवाल: अन्ना आंदोलनकारी से “सुपारी” आंदोलनकारी!!

आन्दोलन की पूरी "तस्वीर" से विकलांग ही गायब!


१. ९ अक्तूबर: रात कोई आठ बजे. आज तक चैनल सलमान खुर्शीद और उनकी बीवी के जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकलांगों की लूट की खबर बड़ी सनसनीखेज अंदाज में शुरू होती है. खबर सच ही है. सारी बातों से ऐसा ही लगता है.

ये खबर कुछ इस तरह पेश की जाती है, मानो अरुण पुरी के
“इंडिया टुडे” के उक्त चैनल ने एकदम अपनी ही पहल पे ये खबर खोज निकाली हो. जबकि बाद की घटनाओं से ये बात बड़े हद तक साफ़ हो जाती कि ये खबर उसकी अपनी “खोज” नहीं है.

बहरहाल, इस खबर के प्रसारित होने के साथ ही पूरे देश में हंगामा मच जाता है, जो कि स्वाभाविक है. और, अन्य अनेक मामलों की तरह रॉबर्ट वढेरा मुद्दा भी थोड़ा दब जाता है. और, चारों ओर सलमान ही सलमान. ये मुद्दा इसीलिए भी आम लोगों में जोर पकड़ता है, क्योंकि यह विकलांगों से जुड़ा मामला है. ऊपर से. सलमान खुर्शीद की अनेक बदतमीजी और चाटुकारिता से भी लोग खासे चिढे हुए हैं. सो, यह मुद्दा और भी तेज़ी से फैलने लगता है.

२. गौरतलब है कि अब तक (९ अक्टूबर, रात आठ-नौ बजे) इस पूरे दृश्य  में  अरविन्द केजरीवाल कहीं भी नहीं. होना भी नहीं था. क्योंकि ये तो उक्त चैनल की अपनी खास
“खोज खबर” थी. लेकिन, दूसरे दिन ही अरविन्द इस मामले में कूद पड़ते हैं और सलमान से इस्तीफे की मांग करते हैं.

 
 वढेरा मुद्दे उठा रहे और दिल्ली चुनाव अभियान चला रहे अरविन्द केजरीवाल ने इसे हाथों-हाथ लपक लिया. तो क्या यह सिर्फ एक संयोग है या पहले से तैयार कोई योजना? उक्त चैनल जब अपना “पोल खोल” चला रहा था, तब उस कार्यक्रम में अरविन्द टीम के भी एक प्रतिनिधि मौजूद थे. वे अरविन्द के कहने पे ही वहां उपस्थित होंगे, इसमें कोई शक नहीं. यानि, इस पोल खोल की सूचना अरविन्द को पहले से ही थी. और, बहुत  संभव है कि पोल खोल के बाद क्या कुछ करना है, ये भी पहले से ही तय हो. अर्थात, इस दलाल मीडिया द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम व आंदोलन का “नेतृत्व” अरविन्द को करना है, ये पहले से ही तय था!! तो क्या ये अन्ना आंदोलनकारी अब 'सुपारी" आंदोलनकारी बनता जा रहा!!

यह  दलाल मीडिया मनमोहन सरकार के एक खास मंत्री के खिलाफ अभियान-आंदोलन चलाने को क्यों इतना उत्सुक? मनमोहनी आर्थिक सुधारों और अमेरिका का बड़ा  समर्थक है ये मीडिया समूह. खुदरा में एफडीआई मामले सहित विभिन्न मुद्दों पे इस मीडिया समूह की नीति अमेरिका पक्षी ही रही है. अन्ना आंदोलन में भी फूट की ख़बरें ये अक्सर ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता रहा है.


बहरहाल, हालांकि ये खबर भी कोई एक साल पुरानी होने के बावजूद ९ अक्टूबर की रात उक्त चैनल सलमान की “पोल खोल” करता है. उसके दूसरे दिन अरविन्द सलमान से इस्तीफे की मांग करते हैं. और, उसी दिन तय होता है विकलांग संगठन द्वारा सोनिया के घर के सामने विरोध प्रदर्शन करना. विकलांगों के संगठन के इस प्रदर्शन में अरविन्द शामिल होने की घोषणा करते हैं. बाद में, विकलांग संगठन अपना फैसला बदल देता है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने प्रदर्शन करना तय करता है...खैर जो भी हो, उसमें भी अरविन्द के शामिल होना तय रहता है... 

यहां देखने की बात ये है कि ये विकलांग संगठन का आंदोलन बड़ी आसानी से अरविन्द द्वारा हाइजैक कर लिया जाता है. एकाध विकलांग
“नेता” का नाम ही कुछ लोगों को याद  होगा, जबकि चारों ओर सिर्फ “अरविन्द-अरविन्द” ही छाये  हुए. मीडिया भी बड़े योजनाबद्ध तरीके से एकदम शुरू से ही विकलांग संगठन की सरासर उपेक्षा करता हुआ सिर्फ अरविन्द-अरविन्द करता है. ऐसा क्यों? जब ये आंदोलन विकलांगों का और उनके संगठन का था और है तो फिर एक बाहरी व्यक्ति को “मसीहा” बनाकर पेश करने का मतलब क्या हुआ??

अरविन्द की पुरानी आदत है, आंदोलनों-अभियानों को हाइजैक करने का. अन्ना आन्दोलन को भी उसने हाइजैक करने की भरपूर कोशिश की, मगर अन्ना ने उसे सफल होने नहीं दिया. वरना, अब अन्ना का फोटो उसके दिल में ही रहता और बाहर अन्ना के सारे आदर्श-सारे विचार रद्दी में पड़े होते. उसकी ये बुरी आदत और हीरो बनने की चाहत को मीडिया और मीडिया के असल सूत्रधार अच्छी तरह जानते हैं. इसीलिए इस मामले में भी उसे हीरो बनाया जा रहा. और वो बड़ी खुशी-खुशी
“महान क्रांति” कर रहा!! इस व्यक्ति को दलाल मीडिया क्यों “खड़ा” कर रहा, इसे पुराने अनुभवी तटस्थ लोग बखूबी समझ सकते हैं.

खैर! ९ अक्टूबर को उक्त चैनल सलमान मामले की पोल खोलता है. उसके दूसरे दिन सुबह ही अरविन्द इस मामले में कूद पड़ते हैं. और उसी दिन शाम में खबर आती है कि कैग ने भी उक्त चैनल की रिपोर्ट  पे अपनी मुहर लाग दी.. (ये और बात है कि बाद में पता चलता है कि यह कैग की अंतिम रिपोर्ट नहीं है. फिर भी इसमें शक नहीं कि सलमान परिवार ने घपला किया ही है.).

क्या ये एक बहुत बड़ा संयोग है? चैनल, अरविन्द और कैग!! यहां मेरा ये मतलब नहीं कि इस सुनियोजित पोल-खोल और आन्दोलन में कहीं से भी कैग का कोई हाथ है. चैनल को कैग की बन रही प्रारम्भिक रिपोर्ट की भनक लगी और उसने इस मुद्दे की थोड़ी ज़मीनी पड़ताल भी कर ली. और, अरविन्द को तो चाहिए ही
“हीरो” बनने के मुद्दे. और, शुरू हो गयी  एक “ध्यान भटकाओ मुहिम”!!

एफडीआई के अलावा मनमोहन सरकार के सारे बड़े-बड़े घोटालों और महंगाई घोटाले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए लाया गया वढेरा कांड भी एक हद तक दब गया!! सलमान के इस्तीफे की मांग को इस तरह से पेश किया जा रहा, मानो इससे मनमोहन सरकार एकदम स्वच्छ बन जाएगी. उसके सारे पाप कट जाएंगे.

जबकि अभी मनमोहन सरकार के इस्तीफे की ही मांग लेकर देशव्यापी एक व्यापक अ-राजनीतिक किस्म का आंदोलन चलाया जाना चाहिए.####


 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

माओवादियों जितनी "सफलता" भी नहीं मिलनी अरविन्द टीम को

अन्ना आंदोलन ही है एकमात्र विकल्प. इससे ही निकल पाएगा कोई स्वस्थ-सशक्त विकल्प. इस आंदोलन में फूट डालने वालों को "सफलता" नहीं मिल सकती!!  इस ऐतिहासिक आंदोलन को खत्म करने की  साज़िश में लगे  दलों  और नेताओं  का दरअसल कोई भविष्य नहीं!!

रविवार, 2 सितंबर 2012

ये भारत है, इसे इंडिया न समझें!

अरविन्द की एनजीओ टीम द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण की समीक्षा का यह दूसरा भाग. 

१. अन्य अनेक दलों की ही तरह अन्ना आन्दोलन में भी अंग्रेजीदां और शहरी मध्य वर्ग का कब्जा है. इसीलिए इन्हें "भारत" दिखता नहीं. इसीलिए कुछ शहरों के चंद हज़ार लोगों के सर्वेक्षण को ये पूरे भारत का मान कर इस तरह पेश कर रहे मानो पूरा जनमत संग्रह ही करवा लिया हो.

२. इस देश में इस अंग्रेजीदां मध्य वर्ग ने अनेक अच्छे दलों-आंदोलनों को नष्ट करने में बड़ी भूमिका अदा की है.  कम्युनिस्ट आन्दोलन  को भी ऐसे ही लोगों ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है.

३. बहरहाल, खुद यह सर्वेक्षण कहता है कि सिर्फ २८ शहरों के मात्र ८ हज़ार आठ सौ तैंतीस लोगों से बातचीत
करके कुछ नतीजे निकाले गए हैं.

४. इस सर्वेक्षण के नतीजों को इसीलिए सिरे से खारिज किया जा रहा, क्योंकि यह भारत देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता. भारत का कोई ७० फीसदी आबादी गांवों-कस्बों में. जबकि यह सर्वेक्षण मात्र २८ शहरों के कुछ हज़ार लोगों का.

५. इसके नतीजे भी परस्पर  विरोधी और अधूरा. एक तरफ नतीजे में यह कहा जाता कि ७७ फीसदी जनता तथाकथित "अन्ना पार्टी" को वोट देने को तैयार. दूसरी ओर भाजपा को २७ फीसदी और कांग्रेस को १८ फीसदी वोट मिलने की भी भविष्यवाणी की जा रही. तो कुल मिला कर कितने फीसदी हुए??

६. उक्त हास्यास्पद आंकड़ों में बाकी दल सिरे से गायब हैं? क्यों? इन २८ शहरों में क्या और किसी दल को कोई वोट नहीं मिलना?? ये भी एक बड़ा मजाक किया है इस सर्वेक्षण में.

७. इस सर्वे में "अन्ना पार्टी" का नाम लिया जा रहा. जबकि अन्ना के सुझावों को ताक पे रख कर कोई अधकचरा दल बनाने की कोशिश में जुटी है अरविंद  की एनजीओ टीम. और, अन्ना ने अपने हाल के ब्लॉग में कोई दल बनाने का जिक्र तक नहीं किया है... वे बस ईमानदार-स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुन कर संसद भेजने की बात कह रहे. ऐसे में "अन्ना पार्टी" का नाम लेना सरासर गलत. और, जब फिलहाल अन्ना की कोई पार्टी होगी ही नहीं, तो फिर इस सर्वेक्षण का कोई मतलब ही नहीं रहता. (वैसे भी यह सर्वेक्षण बिल्कुल फालतू).

८. अरविन्द की एनजीओ टीम ने बड़ी चतुराई के साथ यह फास्ट फ़ूड मार्का सर्वेक्षण इसलिए करवाया, ताकि अन्ना के दिये सुझावों का एक 'जवाब" मिल जाय. अन्ना का एक सुझाव ये भी कि मतदाताओं के कोई ८० फीसदी की सहमति लेकर ही कोई विकल्प बनाया जाय. उनका स्पष्ट कहना है कि गांवों-मुहल्लों में आन्दोलन को ले जाकर आम मतदाताओं से सहमति ली जाय. लेकिन, ये फास्ट फ़ूड कल्चर वाले आन्दोलनकारियों को बड़ी जल्दी लगी हुई है. इसीलिए यह बोगस सर्वेक्षण करवा कर अपने आलोचकों का मुँह बंद करवाने की सतही कोशिश या तिकडम.

९. इस भावी अधकचरी पार्टी ने अब तक महज जनलोकपाल आन्दोलन ही किया है. विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पे इसकी राय के बारे में कोई जानता ही नहीं. फिर कैसे लोगों ने बता दिया कि यह पार्टी नक्सलवाद, आतंकवाद आदि जैसे सभी मुद्दों से निपट सकती है?? ये भी लोगों की आंखों में धूल झोंकने का एक घटिया उपाय.

१०. और, भी कई बातें हैं, जिनपे सवाल खड़े किये जा सकते हैं. लेकिन. फिलहाल इतना ही. इस महा-घटिया सर्वेक्षण पे इतनी लंबी समीक्षा करना भी बेतुका लग रहा. यह उस लायक है ही नहीं. मगर, नहीं करने से अनेक आम आन्दोलनकारी भ्रमित हो सकते हैं, इसीलिए इतना करना जरुरी लगा..

(ऐसा लगता है कि इस सर्वेक्षण को अंतिम रूप दिया गया है अरविन्द एनजीओ के दफ्तर में. जहाँ मीडिया दलाल योगेन्द्र यादव भी मौजूद रहे होंगे. दलाल मीडिया की जबसे अरविन्द टीम में घुसपैठ हुई है, तबसे उसमें भटकाव साफ़ देखा जा रहा.)















शनिवार, 1 सितंबर 2012

दलाल मीडिया पे इतना यकीन क्यों? सर्वे समीक्षा भाग-एक


अभी हाल में ही अरविन्द की एनजीओ टीम द्वारा एबीपी न्यूज- नीलसन द्वारा कराये एक सर्वेक्षण की यहां समीक्षा की जा रही है. इस सर्वेक्षण को अरविन्द टीम इस तरह पेश कर रही मानो एकदम से जनमत सर्वेक्षण करवा लिया गया हो. ऐसे में इसकी समीक्षा जरुरी. यह समीक्षा का पहला भाग है. जिसमें सर्वेक्षण करने वाली मीडिया पे ही मुख्य रूप से चर्चा की गयी है. अगले भाग में सर्वेक्षण के सतहीपन पे होगी चर्चा.

१. इस तरह के कांग्रेसी टाइप सर्वे कराना ही अपने आपमें एक अस्वस्थ परम्परा है. ऐसे सर्वेक्षण वैसे पूंजीवादी-भ्रष्ट दल कराना पसंद करते, जिन्हें जनता को गुमराह कराना होता है.

२. ये सर्वेक्षण खुद अन्ना आन्दोलन से जुड़े ईमानदार-सच्चे कार्यकर्ताओं से कराया जाता, तो वो इससे कहीं अधिक विश्वसनीय माना जाता. भले ही कुछ लोग इसपे उंगलिया उठाते रहते.

३. या फिर, आम जनता के बीच से कुछ अच्छे-ईमानदार लोगों की बड़ी टीम बनाकर भी ये काम कराया जा सकता था, कराया जा सकता है. उसके नतीजों पे कम से कम उंगलियां उठतीं या उठेंगी.

४. ऐसा न करके इस "फास्ट फ़ूड" ज़माने के कुछ लोगों ने बड़ी हडबडी में एक-दो भ्रष्ट व्यावसायिक मीडिया-एजेंसी से ये काम करवाया. ये एक भूल है.

५. सबसे पहले इस एबीपी की असलियत को जान लिया जाय. एबीपी मूलतः एक जनलोकपाल विरोधी कंपनी है. इसके चैनलों में जन लोकपाल का पूरा विरोध हुआ करता था.

६.ये एबीपी उस स्टार न्यूज से जुडी कम्पनी है, जो कि दलाल मीडिया के नाम  से ही कुख्यात है. और, जहाँ ज्यादातर अन्ना आन्दोलन में फूट डालने के ही काम होते रहते. जिसे अब एबीपी ने "खरीद" लिया.

७. एबीपी उस आनंद बाज़ार पत्रिका समूह का ही एक अंग है, जो बुनियाद रूप से महाभ्रष्टों का ही मीडिया है. जहाँ जन लोकपाल के खिलाफ ज़हर ही उगला जाता है.

८. आनंद बाज़ार पत्रिका, एबीपी हर तरह के जन आंदोलनों का विरोधी. सिंगुर आन्दोलन का भी पूरा विरोध किया है. अब भी उस मामले में टाटा की दलाली में जुटा हुआ.

९. आनंद बाज़ार पत्रिका, एबीपी और "स्टार न्यूज" की यह दलाल मीडिया तिकड़ी भला कबसे अन्ना आन्दोलन की समर्थक हो गयी? इसपे गंभीरता से सोचा जाय.

१०. इस दलाल मीडिया का संपर्क अरविन्द टीम से कैसे हुआ, ये तो वे ही जानें. मगर, जिसने भी कराया, उसपे विश्वास करना घातक होगा.

११. २५ जुलाई के वक्त से ही यह दलाल मीडिया अन्ना आन्दोलन भक्त बना दिख रहा!! यह बड़े  ताज्जुब की बात!! जो मीडिया कोलकाता के अन्ना आन्दोलन की खबर एक लाइन भी नहीं देता, वो २४ घंटे लाइव देने लगता है जतर-मंतर से!! वाह!! ये तो बड़े जादू की बात है!!!!!

१२. इस लाइव कवरेज के लिए कितने पैसे खर्च हुए, ये तो अरविन्द की एनजीओ टीम ही जाने.

१३. और, इस एबीपी न्यूज-नीलसन के "फास्ट फ़ूड" सर्वे में कितने पैसे  लगे, ये भी वही एनजीओ टीम जाने. लेकिन, इस सर्वे में अन्ना आन्दोलन के चंदे का दुरूपयोग हुआ है, तो यह एक अपराध ही माना जाएगा.

 (दूसरा भाग आज ही जारी किया जाएगा).