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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

तेलंगाना का दावानल

महंगी पड़ी कांग्रेस की अति धूर्तता

देश में फैलता तेलंगाना का दावानल

किरण पटनायक

कांग्रेस की भूर्खता या अति धूर्तता से तेलंगाना की आग किसी दावानल की तरह देश में फैलती जा रही है। उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, असल, महाराष्ट्र, जम्मू व कश्मीर, गुजरात आदि राज्यों में अलग प्रांत की मांग एक बार फिर तेज हो गयी है। बंगाल में इस आग की आंच सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है। 11 दिसंबर से ही दार्जिलिंग का पर्यटन पूरी तरह ठप्प हो चुका है। हजारों पर्यटक वहां फंसे पड़े हैं या चार गुना अधिक पैसे देकर उन्हें दार्जिलिंग से बाहर निकलना पड़ रहा है। गोरखालैंड की मांग पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आमरण अनशन और बंद से इस बर्फबारी के मौसम में भी पहाड़ों पर आग लगी हुई है।


उप्र में बंगाल जैसा जुझारू आंदोलन तो नहीं चल रहा है, मगर कांग्रेस के तेलंगना कार्ड ने इस राज्य की राजनीति में तेज हलचल पैदा कर दी है। उप्र की स्थिति बंगाल के ठीक उल्ट है। बंगाल की शासक पार्टी सहित लगभग सभी दल अलग प्रांत की मांग का विरोध कर रहे हैं तो उप्र की शासक पार्टी बसपा ने खुद राज्य के चार टुकड़े करने की मांग लेकर केंद्र सरकार की जान सांसत में डाल दी है। बसपा नेता व मुख्यमंत्री मायावती ने खुद राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की जनता से बुंदेलखंड, हरितप्रदेश और पूर्वांचल के लिए आंदोलन चलाने का आह्वान किया है। उप्र में एक समाजवादी पार्टी को छोड़ लगभग सभी दल बंटवारे के पक्षधर हैं।


उप्र का विभाजन

कांग्रेस बुंदेलखंड अलग प्रांत की मांग लेकर आंदोलन चला रही है। राहूल गांधी इसे बढ़ावा दे रहे हैं। बुंदेलखंड मुक्तिमोर्चा नामक कांग्रेस समर्थक संगठन उप्र और मप्र के बुंदेलखंड क्षेत्रों को लेकर अलग प्रांत बनाने की मांग कर रहा है। पश्चिमी उप्र में हरितप्रदेश के लिए अजित सिंह की पाट ने आंदोलन छेड़ रखा है। अजित सिंह का कहना है, हिंसक आंदोलन के बिना केंद्र सरकार की नींद नहीं खुलती। केंद्र के रवैये ने यही जताया है कि मांग मनवानी हो तो तोड़फोह़ आगजनी से आंदोलन चलाये जाए।


बिहार विभाजन

12 दिसंबर को प्रेस सम्मेलन करके मायावती ने बुंदेलखंड और हरित प्रदेश को उत्तरप्रदेश से अलग करने की मांग की। दो दिनों बाद उनके एक सचिव ने बाराणसी आदि को लेकर अलग पूर्वांचल प्रांत की भी मांग पेश कर दी। पूर्वांचल राज्य की मांग लालू प्रसाद भी करने लगे हैं। उनकी मांग है कि उप्र और बिहार के भोजपुरी क्षेत्रों को मिला कर पूर्वांचल राज्य की स्थापना हो। भोजपुर की मांग से बिहार के मिथिलांचल में भी अलग प्रांत की मांग की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। बुंदेलखंड और भोजपुर की ही तरह मिथिला का भी बहुत पुराना इतिहास है। लेकिन बिहार की अधिकांश जनता राज्य का और अधिक विभाजन नहीं चाहती। पहले ही इस राज्य से झारखंड अलग हो चुका है, जिससे बिहार की हालत लगभग कंगाल जैसी हो गयी है; क्योंकि लगभग सारे उद्योग और खदान झारखंड में रह गए। लेकिन कांग्रेस के तेलंगाना कार्ड से लगी आग बढ़ती गयी तो बिहार का दो-एक विभाजन और भी हो सकता है। शायद मगध और वैशाली नामक राज्य मी बन जाए। तब बिहार का नामोनिशान मिट जाएगा। छोटे-छोटे राज्यों के कट्टर पक्षधर भी इस तरह के अलग प्रांतों का समर्थन नहीं करते। हर जिले या दो-चार जिलों को मिलाकर एक राज्य बना देने से सहूलियत के बजाए मुश्किले ही ज्यादा पेश आनेवाली हैं।


उड़ीसा का विभाजन

उड़ीसा में भी पश्चिम उड़ीसा के लिए वर्षों से छिटपुट आंदोलन चल रहा है। सुंदरगढ़ से लेकर कालाहांडी तक कई जिलों को मिलाकर एक अलग संबलपुरिया प्रांत की मांग हो रही है। हालांकि अभी इसे वहां की अधिकांश जनता का समर्थन हासिल नहीं है। पूर्वी उड़ीसा यानि कटकी लोगों के वर्चस्व के खिलाफ संबलपुरिया जनता का यह एक तरह का विद्रोह है। कांग्रेस के मूर्खतापूर्ण या अति धूर्ततापूर्ण तेलंगाना कार्ड के कारण यह मांग जोर पकड़ने लगी है। झारखंड में भी अलग संथाल परगना राज्य की मांग की जानी शुरू हो चुकी है। आदिवासी राज्य से एक अन्य आदिवासी क्षेत्र अलग होने को बेचैन दिखने लगा है।


क्षेत्रीय आधार

उधर जम्मू व कश्मीर राज्य में भी जम्मू को अलग प्रांत और लद्दाख को केंद्र शासित राज्य बनाने की मांग तेज हो गयी है। असम में बोडोलैंड और गुजरात में सौराष्ट्र राज्य की मांग में भी तेजी देखी जा रही है। महाराष्ट्र में भी विर्दभ के लिए हलचल तेज हो गयी है। यही हाल रहा तो राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में भी परंपरागत क्षेत्रों को लेकर मांगे शुरू हो जाए तो ताज्जुब नहीं।

आंध्र में फिलहाल तेलंगाना की ही मांग हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में आंदोलन चल रहे हैं। लेकिन वह दिन दूर नहीं ‍जब आंध्र के परंपरागत क्षेत्र रायलसीमा में भी अलग प्रांत की मांग शुरू हो जाए। तब तटीय क्षेत्र में सिमट कर रह जाएगा आंध्रप्रदेश या फिर आंध्रप्रदेश का नामोनिशान ही मिट जाएगा।

यहां विचारणीय है कि अलग प्रांत बनाया जाना उचित है या नहीं। इस पर पक्ष-विपक्ष में अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन पिछले तीस वर्षों में इसके पक्ष में दिए जानेवाले तर्कों का वजन बहुत अधिक बढ़ गया है। अपेक्षाकृत बड़े राज्यों को विभाजित करके राज्य बनाये जाएं तो इससे विकास कार्य और प्रशासनिक रूप से आग जनता को सहूलियत ही होगी, वरना पहले दुमका या डाल्टेनगंज की जनता को छोटे-मोटे कामों के लिए भी हजारों रुपए खर्च करके चार-सात दिन बर्बाद करके पटना जाना पड़ता था। झारखंड बन जाने के बाद अनेक लोगों को थोड़ी सुविधा हो गयी है। यही बात अन्य बड़े राज्यों पर भी लागू होती है।


भाषाई आधार

भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण करना एक बड़ी भूल थी। इससे भाषावाद और प्रांतवाद को बढ़वा मिला। जबकि आजादी के बाद ही प्रशासनिक आधार पर पचास-साठ राज्यों का गठन कर दिया जाना चाहिए था। इससे भारतीय राष्ट्र की अवधारणा मजबूत होती। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राष्ट्रीय भावना काफी प्रबल थी। उसी समय हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं को द्वि-भाषा के आधार पर विभिन्न प्रशासनिक तथा परंपरागत क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करते हुए भारत राष्ट्र की भावना को शक्ति प्रदान की जा सकती थी। मगर जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस की फूट परस्त नीति और दिमागी दिवालिएपन के कारण ऐसा नहीं हो सका।

भाषा को सबसे अधिक महत्व दिया गया, मानो भाषा ही एकता की एकमात्र सूत्रधार हो। मजहब को इसी तरह सबसे बड़ा और एकमात्र एकता का आधार मान कर पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी। सोचा गया था कि इस्लाम एक ऐसा सीमेंट है जिससे मुसलमान जनता को एकसूत्र में बांध पर कुछ भी मनमानी की जा सकती है। कठमुल्ले इस्लामवादियों के इस भ्रम को पूर्वी पाकिस्तान ने चूर-चूर कर दिया। बांग्लादेश ने बताया कि मजहबी एकता से कहीं बड़ी चीज है भाषा।


पार्ट -2

उर्दू के विरोध में बांग्लाभाषा के लिए पूर्वी पाकिस्तान ने धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश की स्थापना की लड़ाई लड़ी। पाकिस्तानी मुसलमानों ने बांग्लादेशी मुसलमानों का जमकर कत्लेआम किया। इस्लामवाद की धज्जियां उड़ गयीं। और यह हुआ भाषा को लेकर।

नेहरू और उनकी कांग्रेस भाषा के प्रभाव को बखूबी समझती थी। इस मामले में इस्लामवादियों की तुलना में कांग्रेसी चिंतक कहीं आगे थे। मगर आंध्रप्रदेश की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ भाषा के आधार पर किसी देश या राज्य को एकसूत्र में नहीं बांधे रखा जा सकता। उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात सहित हिंदी प्रदेशों में भी कुछ ऐसा ही हुआ और हो रहा है। खासकर आंध्र की घटना ने यह साबित कर दिया कि भाषा के आधार पर राज्यों के गठन का कांग्रेसी फैसला गलत था। राज्यों के गठन के लिए झारखंड, विदर्भ, तेलंगाना, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़ आदि परंपरागत क्षेत्रों की भावनाओं और वास्तविकता को भी ध्यान में रखा जाना जरूरी था। और इन सबसे बड़ी बात यह कि विकास कार्यों तथा आम जनता की सहूलियत को ध्यना में रखते हुए प्रशासनिक आधार को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए था। बहरहाल, इसमें लंबी चर्चा की जा सकती है, की जानी चाहिए। फिलहाल यहां इतना ही पर्याप्त है।


राजग सरकार की समझदारी

जहां तक वर्तमान तेलंगाना आंदोलन की बात है तो कांग्रेस की अति धूर्तता के कारण ही यह आग इतनी फैल गयी। याद करें कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के गठन के वक्त ऐसी आग नहीं लगी थी। छत्तीसगढ़ में कोई बड़ा आंदोलन भी नहीं था। उत्तराखंड में चल रहा आंदोलन उग्र रूप धारण नहीं कर पाया था। झारखंड का आंदोलन कभी जरूर उग्र रूप ले लिया करता था। लेकिन इन ‍तीनों राज्यों के निर्माण के समय कोई रक्तपात, तोड़फोड़, आगजनी की कोई बड़ी घटनाएं नहीं हुई। इसके लिए राजग सरकार धन्यवाद की पात्र है, वहीं इन तीनों (तत्कालीन बिहार, उप्र, मप्र) राज्यों के तत्कालीन राजनीतिक समीकरण के कारण भी लगभग शांतिपूर्ण तरीके से तीन नए राज्यों का निर्माण हो पाया।

बिहार विधानसभा ने पहले ही झारखंड अगल राज्य के पक्ष में मतदान कर रखा था। लालू यादव की राजनीतिक मजबूरी के कारण ही ऐसा संभव हो पाया था। जबकि भाजपा, झामुमो, सीपीआई आदि दल पहले से ही झारखंड राज्य के पक्ष में थे। दिल्ली में भाजपा नेतृत्व की राजग सरकार बनने से भाजपा-जदयू की पहल पर झारखंड राज्य के निर्माण को हरी झंड़ी दिखा दी गयी। भाजपा वर्षों से बिहार में सरकार बनाने के सपने देख रही थी, मगर उसे कभी भी तत्कालीन बिहार में बहुमत नहीं मिल पाया। लेकिन तत्कालीन बिहार के झारखंड क्षेत्र में भाजपा-जदयू को बहुमत प्राप्त था। सो राजग सरकार ने वहां अपनी सरकार बनती देख तुरंत झारखंड राज्य का गठन कर दिया। उप्र और मप्र के विभाजन में भी यही समीकरण काम कर रहा था। उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में भी पहली सरकार भाजपा की ही बनी।

आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के निर्माण से कांग्रेस नए या छोटे राज्य के निर्माण की लगभग विरोधी रही है। बल्कि कहा जाए कि महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश का गठन भी बड़े और हिंसक आंदोलन के बाद ही हुआ। वो भी भाषा के ही आधार पर। हालांकि बाद में और भी कुछ राज्य बने, मगर कांग्रेस मोटेतौर पर नए राज्यों के निर्माण का विरोध ही करती रही। झारखंड आदि राज्यों के निर्माण का भी कांग्रेस ने विरोध किया था। लेकिन तेलंगाना अलग राज्य के लिए केंद्रीय कांग्रेस भला कैसे तैयार हो गयी?

तेलंगाना राज्य आजादी प्राप्ति के बाद ही बन जाना चाहिए था। मगर 1953 में आंध्रप्रदेश के गठन के समय भी तेलंगाना राज्य नहीं बनाया गया। उसे आंध्र में शामिल कर दिया गया। तर्क वही भाषा का ही था। लेकिन तेलंगाना की मांग जारी रही। हाल के वर्षों में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (तेरास) के आंदोलन से इस मांग को बल मिला। 2004 में चुनावी फायदे की गरज से कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य का समर्थन किया। और आंध्र समेत केंद्र की गद्दी पर आसीन हुई। गद्दी पाते ही कांग्रेस ने तोते की तरह आंखें फेर ली। चंद्रशेखर राव की मांग ठुकरा दी गयी। हालत इस कदर बदतर हुई कि तेरास ने संप्रग छोह़ कर तेलुगु देशम और वामो का दामन थाम लिया। उसके बाद वह भाजपा, राजग से भी जा मिली। और आखिरकार अलग राज्य की मांग पर चंद्रशेखर राव ने आमरण अनशन कर एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया।


भाजपा लाइन की फूहड़ नकल

आंदोलन की तीव्रता और तेलंगाना क्षेत्र में खुद को अलग-थलग होता देख कांग्रेस ने भाजपा की लाइन अख्तियार करने का फैसला किया। दोनों हाथ में लड्डू पाने के लिए केंद्रीय कांग्रेस और उसकी केंद्र सरकार ने बड़ी जल्दबाजी में तेलंगाना राज्य बनाये जाने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी। और, कांग्रेस सरकार यहीं चुक गयी। उसके तेलंगाना कार्ड के कारण न सिर्फ आंध्र में बल्कि देश भर में पृथक राज्यों की आग दावानल बन कर फैलती जा रही है।

केंद्रीय कांग्रेस ने भाजपा राजग सरकार की नकल पर आंध्र और तेलंगाना राज्यों में अपनी सरकार बनाने के लिए अलग राज्य को अपना समथर्न दे तो दिया, लेकिन वह अपने तानाशाही स्वभाव के कारण राज्य की जनता और वहां की जनता और वहां की विधानसभा को अपने विश्वास में लेना भूल गयी। भाजपा ने उप्र और मप्र के विभाजन से पहले बड़ी सफाई से वहां की विधानसभाओं में राज्यों के विभाजन के पक्ष में मतदान करवा लिया था। मतदान के पहले और बाद में भाजपा ने वहां के जनमानस को तैयार करने का काम भी एक हद तक किया। लेकिन कांग्रेसी नेतृत्व एक व्यक्ति या एक परिवार की तानाशाही पर आधारित है, वहां राज्यों, जिलों के नेता तक आला कमान द्वारा थोपे जाते हैं। इसी तानाशाही सोच के कारण ही केंद्रीय नेतृत्व ने बड़ी जल्दबाजी में खुद को बहुत बड़ा चतुर समझते हुए उक्त चूक कर ‍दी। अब आंध्रप्रदेश के तेलंगाना समर्थकों और विरोधियों को समझाने-धमकाने में आला कमान को दिनरात एक करना पड़ रहा है। फिर भी सफलता मिलती नहीं दिख रही।

आमरण अनशन में बैठे चंद्रशेखर राव को बचाने की ईमानदार और जनतांत्रिक कोशिश की गयी होती तो केंद्रीय कांग्रेस को चाहिए था कि वह पहले अपने मुख्यमंत्री सहित वहां के मंत्रिमंडल और अपने विधायक-सांसदों को विश्वास में लेती। मुख्यमंत्री को चंद्रशेखर राव के पास भेजा जाता और उनसे आमरण अनशन तोड़ने का अनुरोध ‍करने को कहा जाता। साथ ही कांग्रेसी तथा विपक्षी विधायकों भी विश्वास में लेने की प्रक्रिया शुरू की जाती। लेकिन प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष आदि ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। महामूर्ख की तरह खुद को सबसे बड़ा चतुर मानते हुए कांग्रेस आलाकमान के इशारे पर केंद्र सरकार ने तेलंगाना अलग राज्य गठन की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा कर दी। और देश में आग लगा दी। महंगाई, बेरोजगारी, अकाल, बाढ़, जबरिया भूमि अधिग्रहण आदि बड़े-बड़े मुद्दे किनारे लग गए और जिले-जिले को अलग प्रांत बनाने का मुद्दा प्रमुख बन गया। कुछ राज्य जरूर बनने चाहिए, मगर अलग राज्य बनाने भर से महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी की समस्या खत्म हो जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। तीन नए राज्यों के बदतर होते हालात यही साबित करते हैं। इसलिए अगल प्रांत के आंदोलनों से कहीं ज्यादा जरूरी है, जनता की रोजी-रोटी की विकराल समस्याओं को लेकर देश भर में एकजुट आंदोलन चलाया जाना। ऐसा करते हुए भी कुछ अत्यंत जरूरी अलग राज्य के आंदोलन चलाये जा सकते हैं।

बहरहाल, केंद्र सरकार को नए राज्य के गठन का सांवैधानिक अधिकार जरूर है, मगर विधानसभाओं सहित विभिन्न राज्यों की जनता को इसके लिए तैयार किया जाना कहीं ज्यादा जरूरी है। तेलंगाना राज्य पर केंद्र सरकार की मानमानी घोषणा के कारण ही मायावती को अपनी राजनीति चलाने का मौका मिल गया। अब वह कह रही हैं कि पहले केंद्र सरकार उत्तरप्रदेश के चार टुकड़े करने पर निर्णय कर ले, तब वे भी राज्य में आगे की कार्रवाई करेंगी। गोरखालैंड, बोडोलैंड आदि का भी कुछ ऐसा ही कहना है। हालांकि केंद्र सरकार ने साफ-साफ कह दिया है कि तेलंगाना को छोड़ देश में और किसी नए राज्य के गठन का कोई इरादा नहीं है, लेकिन छत्ते को एक बार छेड़ देने के बाद मधुमक्खियों के कहर से बचना मुमकिन है? ....... (यह आलेख मैंने कोई एक-डेढ़ साल पहले लिखा था. लेकिन यह अब भी ताज़ा है... इससे आपको अनेक सूचनाएं मिल जाएंगी. हालांकि फिलहाल यह आन्दोलन देश में नहीं चल रहा. यह अभी आन्ध्र प्रदेश तक ही सीमित है. मगर यह कभी भी देश के अन्य हिस्सों में फिर से जोर पकड़ सकता है.)....(समाप्त)

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