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मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

ईमानदारों का चुनाव लड़ना जरुरी

प्रिय श्री अरविन्द केजरीवाल जी,

सप्रेम वंदे.

कल एक पत्र दिया है. आपने और अन्ना साहेब ने देखा होगा.

आप लोगों को विभिन्न स्थानों में चुनाव लड़ने के मामले में बोलते हुए सुन रहा हूं.

इस बारे में मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं.

आपलोग बार-बार यह कह रहे हैं कि मैं चुनाव में खड़ा हुआ तो मेरी जमानत तक जब्त हो जाएगी. सही बात है. लेकिन, इतना भर कहने से लोगों का मार्गदर्शन नहीं होने वाला.

आपलोगों ने यह भी कहा है कि अभी जनता ने अपने वोट की कीमत नहीं जानी है. वह सौ रुपए या शराब की एक बोतल के बदले भ्रष्टाचारियों को अपना वोट दे दिया करती है.यह भी सही बात है. लेकिन इससे भी काम पूरा नहीं होता. वैसे इस तथ्य से अधिकांश लोग अवगत हैं.

यह सही है कि फिलहाल जन-लोकपाल क़ानून के लिए संघर्ष चल रहा है. मगर, खुद अन्ना साहेब ने कहा है कि इसके बाद चुनाव सुधार, राईट टू रीकॉल जैसे मुद्दे भी उठाये जाने वाले हैं. तो जब चुनाव लड़ने की बात आती है तो चुनाव सुधार पर जरा विस्तार से अपनी बात रखना जरुरी है. जैसे कि चुनाव को कम से कम खर्चीला बनाने के लिए कड़ा क़ानून बनाने की बात भी कही जानी चाहिए.

चुनाव कम खर्चीला होगा तो भ्रष्टाचार की गुंजाईश भी कम हो जा सकती है. इससे अन्ना जैसे सैकड़ों-हजारों लोग चुनाव लड़कर जीत सकते हैं.

चुनाव को कम खर्चीला बनाने के लिए कड़ा क़ानून बने. और जो इसका उल्लंघन करे उसका नामांकन वापस ले लिया जाय और उसे जेल की सजा हो.

इस तरह के अन्य अनेक प्रावधानों के जरिए वर्तमान चुनाव प्रक्रिया में जनतांत्रिक सुधार किये जा सकते हैं. मुझे पता है यह भी बहुत मुश्किल लड़ाई है, मगर आपलोग इस मुश्किल लड़ाई को आसान बना देंगे.

एक बात और. यह सही है कि फिलहाल आपलोगों को चुनाव नहीं लड़ने चाहिए. लेकिन इसे अपना स्थायी सिद्धांत बना लेना भी उचित नहीं होगा. क्योंकि ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति अगर सक्रिय राजनीति नहीं करेंगे तो कोई भी क़ानून सही ढंग से लागू नहीं हो सकेगा. इसीलिए आपलोग जो देशव्यापी संगठन बनाने जा रहे हैं, उसे आज नहीं तो पांच-छः साल बाद ही सही चुनाव में उतरना चाहिए. सही-ईमानदार-देशभक्त लोगों का संगठन अगर देश की सत्ता पर काबिज होगा तो करोड़ों भूखे-नंगे देशवासियों की स्थिति में बेहतरी के अनेक रास्ते खुल जाएंगे.

छोटा मुंह बड़ी बात! अन्ना जी से जरुर कहें कि अभी जो उन्हें आनंद मिल रहा है, सत्ता पर आने के बाद करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी-दाल-सब्जी-दूध-फल देने से इससे कहीं अधिक आनंद मिलेगा. यह आनंद शब्द मैंने अन्ना जी के बयान से ही लिया है, तब आप और किरण बेदी जी भी वहां मौजूद थे. महात्मा गांधी की तरह या लोकनायक जयप्रकाश की तरह सत्ता से बाहर रहने की जिद ठान लेने से काम नहीं चलेगा. इससे भ्रष्टाचारी नेता और दल खुश होते हैं और देश को जहन्नुम की ओर ले जाते हैं। अब तक ऐसा ही होता रहा है और अभी भी यही हो रहा है।

अंतिम बात. नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार यथासंभव बेहतर काम कर रहे हैं, इसमें शक नहीं. ग्राम विकास या भ्रष्टाचार के सिलसिले में उनकी तारीफ़ भी की जानी जरुरी है. नितीश कुमार एक हद तक और नरेंद्र मोदी बड़े हद तक भ्रष्टाचार विरोधी शासन चला रहे हैं. उन्होंने मिसाल कायम की है. लेकिन चुनाव के मामले में तानाशाही लादना उचित नहीं. जिसे मर्जी वोट दे या न दे. वोट नहीं देने पर कोई दंड देने का प्रावधान सरासर हिटलरवादी रवैया है. इसके लिए मोदी की आलोचना होनी चाहिए. लोगों को जागरूक बनाकर ही शत-प्रतिशत मतदान करवाना जनतांत्रिक होगा.

इसके अलावा अन्ना तथा आप सबों को गुजरात दंगों की सख्त आलोचना भी करनी चाहिए. इससे आम लोगों पर अच्छा असर पड़ेगा. कहने का मतलब यह नहीं कि दंगों की आलोचना को ही मुख्य मुद्दा बनाकर असली मुद्दों से लोगों का ध्यान मोड दिया जाय, जैसा कि काँग्रेस और उसके भ्रष्ट समर्थक कर रहे हैं.

इति.

आप सबका अपना ही-

किरण (शंकर) पटनायक

कोलकाता.

2 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी अच्छी सलाह है. इस पर सही समय पर अम्ल किया जाना चाहिए.
    चुनाव के खर्च कम से कम होने ही चाहिए, इसके लिए कड़े क़ानून बनाए जाने जरुरी हैं.

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  2. ऊमदा लेख ... सही मुद्दे उठाये हैं ... अन्ना और उनके सहयोगी पहले भी आपकी बातें ध्यान से सुनकर उनपर अमल भी करते रहे हैं ... उपरोक्त मुद्दों को भी पूरी तरह से ध्यान में लिया जाएगा ... अन्ना कभी अपनी 'ज़िद' को देशहित के ऊपर हावी नहीं होने देते ...

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