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रविवार, 17 अप्रैल 2011

काले अंग्रेजों की साजिश

२००८ में परमाणु समझौते के समय जिस तरह मनमोहन सरकार को बचाने के लिए करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह खर्च किये गए थे, ठीक उसी तरह इस बार भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उसके अगुआ लोगों को बदनाम करने के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च किये जा रहे हैं. इसमें अब शक नहीं.

उस समय भी मनमोहन सरकार को बचाने के लिए अमर सिंह जैसे "दलाल" किस्म के नेता को लगाया गया था, इस बार भी उन्हीं को इस चरित्र हनन अभियान में लगाया गया है. फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय अमर सिंह मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा में थे, जबकि अब वे उस दल में नहीं हैं. लेकिन अचरज की बात है कि मुलायम सिंह जी ने चुप्पी क्यों साध रखी है? उनकी याददाश्त भी क्या अमर सिंह की तरह कमजोर तो नहीं! या फिर वे भी इस चरित्र हनन के षड्यंत्र में अमर सिंह के साथ शामिल हैं? हालांकि अमर सिंह को इस दुष्प्रचार के काम में कुछ बड़े कांग्रेसी नेताओं-मंत्रियों ने ही लगा रखा है. तो क्या इस कांग्रेसी साजिश को मुलायम सिंह का भी समर्थन हासिल है? २००८ में मनमोहन सरकार को अनैतिक ढंग से बचाने में मुलायम ने पूरा साथ दिया था.

प्रशांत २ जी से जुड़ा एक मामला भी लड़ रहे हैं और इसमें अनेक उद्योगपतियों सहित अनिल अंबानी भी शामिल हैं. और अनिल के साथ अमर तथा मुलायम के पुराने गहरे रिश्ते रहे हैं. तो क्या अनिल को बचाने के लिए अमर और मुलायम में एक बार फिर एका हो गया है? और काँग्रेस सरकार तो चाहती ही है कि किसी भी तरह अन्ना हजारे के आंदोलन को बदनाम कर दिया जाय और उनके सिपहसालारों भ्रष्ट साबित करके आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी जाय. इसीलिए पहले लोकपाल समिति में नागरिक प्रतिनिधित्व पर वंशवाद के आरोप लगवाए गए, जब यह हथकंडा बेअसर रहा तो अब इसके प्रमुख सदस्यों को भ्रष्ट बताने का कुचक्र शुरू किया गया है. पुरानी नीति है साधु को भी चोर साबित कर दो तो आपकी चोरी-डकैती-लूटमार आसानी से चलती रहेगी. चोरों का दल इस बार भी साधुओं को चोर साबित करने के महा षड्यंत्र में जुट गया है.

इसके लिए करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे है, वरना तथाकथित "बड़े-बड़े अखबारों" ने कैसे उस जाली सीडी को सही बता दिया. जबकि किसी प्रयोगशाला और विशेषज्ञ के नाम तक नहीं बताए गए. इनमें से एक "बड़ा अखबार" कांग्रेसी पत्रकारों को बड़े-बड़े पदों पर रखा हुआ है. जबकि दूसरा एक "बड़ा अखबार" भी बहुत पहले से ही कांग्रेसी प्रवृत्ति का रहा है, इसके अलावा ये दोनों ही "बड़े अखबार" देश के बड़े पूंजीपतियों के हैं. तो क्या इन पूंजीपति अखबारों ने अपने भ्रष्ट भाइयों (नेताओं और उद्योगपतियों) को बचाने के प्रयास शुरू कर दिये हैं? एक अन्य "बड़ा अखबार" भी शांति भूषण को बदनाम करने की साजिश में शामिल दिखता है. इससे ऐसा ही लगता है कि इस देश के भ्रष्टों की शक्तिशाली टोली पूरे दम ख़म के साथ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को तोड़ने की साजिश में जुट गयी है. इसमें अमर सिंह जैसे लोग महज मोहरा हैं. इन अखबारों को कितने में खरीदा गया? ये लोग दो-चार करोड में तो बिकने वाले नहीं हैं, तो फिर इन्होने कितने अरब में अपनी पत्रकारिता बेचीं ? इन सबकी जांच होनी चाहिए.

बहरहाल, प्रशांत भूषण के प्रेस सम्मेलन से यह पूरी तरह साफ़ हो जाता है कि उनके पिता शांति भूषण के विरुद्ध जारी किया गया ऑडियो सीडी जाली है और उसे इधर-उधर से जोड़ा गया है. इस सिलसिले में प्रशांत ने अमेरिका और हैदराबाद की दो विख्यात तथा विश्वसनीय प्रयोगशालाओं से कराई गयी जांच को भी सामने रखा. उनसे साफ़ हो गया कि किस तरह २००६ में मुलायम सिंह और अमर सिंह के बीच हुई एक बातचीत की सीडी के कुछ हिस्से को काटकर एक नयी सीडी बनायी गयी और उसमें शांति भूषण जी की अन्यत्र कही गयी कुछ वाक्य जोड़ दिये गए.
इस बारे में प्रशांत ने विस्तार से दोनों सीडी के हिस्से सुनवाए और उनकी अनेक कापियां प्रेस में वितरित भी की गयी.

अब वे उच्चतम न्यायालय में इस सिलसिले में अदालत की अवमानना से संबंधित एक मुकदमा करने जा रहे हैं, ताकि मामले की जड़ तक जाया जा सके और जाली सीडी जारी करने वाले तथा उसे सही बताने वालों को सज़ा हो सके और उन्हें जेल भेजा जा सके.

प्रशांत ने साफ़-साफ़ कहा है कि मीडिया के कुछ लोग भी इसके लपेटे में आयेंगे, क्योंकि वे भी इस साजिश में शामिल हैं.

बहरहाल, आम लोगों को इस षड्यंत्र से सावधान रहते हुए भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को और भी मजबूत बनाने के काम को आगे बढ़ाना चाहिए. गोरे अंग्रेजों ने आज़ादी की लड़ाई को तोड़ने के लिए अनेक साजिशें की थीं, लेकिन अंततः उनकी हार हुई. इन काले अंग्रजों के षड्यंत्रों को नाकाम बनाते हुए इन्हें भी करारी शिकस्त देनी होगी.

1 टिप्पणी:

  1. मीडिया वालों को ऐसी साजिशों में शामिल होकर पत्रकारिता को बदनाम नहीं करना चाहिए. और जो लोग ऐसी साजिश में शामिल हैं उन्हें जेल जाना ही चाहिए.

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