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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

मीडिया का शीर्षासन - भाग-२

विनोद शर्मा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न

ध्यान रहे विनोद शर्मा के अखबार ने भी उस फर्जी सीडी को सच्चा बताया है. इन दोनों अख़बारों ने किसी प्रयोगशाला का नाम तक बताना उचित नहीं समझा और न ही किसी विशेषज्ञ का नाम बताया है. इस पर श्री विनोद शर्मा जी स्रोत की गोपनीयता की झूठी दुहाई देते हैं. वे बड़ी शान से सीना पीटकर खुद को बड़े ईमानदार पत्रकार बताते हैं. लेकिन किस प्रयोगशाला में किस विशेषज्ञ के जरिए सीडी की जांच करायी गयी, वे नहीं बताते. इसीसे उनकी और उनके अखबार की नीयत (या बदनीयत) का पता चल जाता है.

अर्णब ने अपने कार्यक्रम में उन्हें बहुत अधिक छूट दे रखी थी. तभी वे कहते हैं कि वे करोड़ों में नहीं खेल रहे, वे अब भी मध्य वर्गीय जीवन जी रहे हैं. और अपने बल पर इस मुकाम पर पहुंचे हैं. सही कहा! लेकिन सच यह भी है कि मध्य वर्ग का हर आदमी ईमानदार नहीं होता. कुछ लोग सौ-दो सौ में भी बिक जाया करते हैं. कुछ लोग छोटे-मोटे पदों के लिए भी अपने ईमान का सौदा कर लिया करते हैं. क्या आप भी ऐसे ही छोटे-मोटे आदमी हैं? और हर करोड़पति भ्रष्ट नहीं होता. अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी आदि अनेक लोग करोड़पति बन चुके हैं. क्या विनोद शर्मा उन्हें भ्रष्टाचार के जरिए करोड़पति बना बताएंगे?

बहरहाल, अमर सिंह की तरह आलतू-फालतू बकवास करने के बजाय विनोद शर्मा और उनके अखबार ने अगर सीडी की जांच करने वाली प्रयोगशाला के बारे में बता दिया होता तो उनकी पत्रकारी नैतिकता प्रमाणित हो जाती. वैसे भी विनोद शर्मा को घुमा-फिराकर कांग्रेस के बचाव में ही सुना जाता रहा है. इससे इस सीडी कांड के पीछे कांग्रेस के हाथ की पुष्टि होती है. ऊपर से महान ईमानदार मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इस मुद्दे पर अब तक की चुप्पी भी इसी ओर इशारा कर रही है, जबकि अन्ना हजारे ने पत्र लिखकर सोनिया गांधी से इस बाबत जवाब भी माँगा है कि क्या वे भी दिग्विजय और सिब्बल के भ्रामक प्रचार अभियान से सहमत हैं. अब सोनिया गांधी इसका जवाब देने के लिए अपने सलाहकारों से सलाह ले रही होंगी. उनका जवाब चाहे जो भी आये, मगर इतना तय है कि कांग्रेस का प्रत्यक्ष-परोक्ष फूट डालो अभियान जारी रहेगा. विनोद शर्मा जैसे पत्रकार अब खुलकर भ्रष्टों के समर्थन में अपने पवित्र पेशे का दुरूपयोग करने में जुट गए हैं.

पत्रकार जगत तथा ईमानदार श्रमजीवी पत्रकारों को दलाल किस्म के पत्रकारों का बहिष्कार करना चाहिए.

उम्मीद थी कि अर्णब भी ऐसा ही करेंगे, लेकिन उन्होंने विनोद शर्मा को इतनी छूट देकर अपने सारे किये-कराये पर पानी फेर दिया. आखिर वे भी क्या करें, उन्हें तो उसी कम्पनी की चाकरी करनी पड़ रही है जिसके अखबार ने भी प्रयोगशाला और विशेषज्ञों का नाम बताए बिना सीडी को सच्ची बता दिया है. अब उस कंपनी के मालिकों ने अर्णब की नकेल कस दी है. अब वे भ्रष्टों के तरफ़दारों के बजाय भ्रष्टाचार के विरोध में संग्राम चलाने वालों को अपने कठघरे में खड़ा करने लगे हैं. अर्णब का यह पतन पूरी पत्रकारिता का पतन है. लेकिन जब तक बड़े सेठों और दो नंबरियों के हाथों में पत्रकारिता की कमान रहेगी, तब तक पत्रकारिता के पतन पर आम लोग इसी तरह आंसू बहाते रहेंगे. भला हो लघु पत्रिकाओं और इंटरनेट की सामाजिक पत्रकारिता का, वर्ना अनेक दुष्कर्म दबे रह जाते.

याद करें, नीरा राडिया कांड को तथाकथित मुख्यधारा के अखबारों तथा चैनलों ने किस तरह दबा दिया था. उस समय अगर छोटे अखबारों और इंटरनेट की सामजिक पत्रकारिता ने हंगामा खड़ा नहीं किया होता तो २ जी मामला भी शायद सामने नहीं आया होता और अनेक बड़े पत्रकारों के दलाल चेहरे भी दबे-छिपे होते. बड़े अफ़सोस की बात है कि भारत में हिंदी के लेखक-पत्रकार इस सामाजिक मीडिया का सही इस्तेमाल करके किसी सामजिक क्रांति का रास्ता साफ़ नहीं कर रहे. बल्कि अंग्रेजी में यह काम किया जा रहा है. हिंदी के देशभक्तों को सेठिया अखबारों और चैनलों के जाल से बाहर आकर इस सामाजिक मीडिया को एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए. यह आम जनता का अपना मीडिया है. जब इस पर भी लगाम लगाई जाने लगेगी तब कोई और रास्ता निकाला जाएगा. फिलहाल इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाय.


जारी...... कृपया kiranshankarpatnaik.blogspot.com के ब्लॉग आलेख पढ़ा करें.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके सभी लेख पढ़ गया. काफी विचारोत्तेजक है. सच बात है, भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को तोड़ने की बड़ी साजिश की जा रही है. लेकिन देश के करोड़ों लोग हजारे के अभियान के साथ हैं. आप इसी तरह लिखते रहें.

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  2. वाह, मीडिया पर गहरी चोट की है। सामाजिक मीडिया की भूमिका आज इतनी महत्वपूर्ण हो गयी है कि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। बधाई।

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