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मंगलवार, 21 जून 2011

सोनिया गांधी की यात्रा का खर्च 1850 करोड़ - भाग- १

सोनिया गांधी की यात्रा खर्च का घोटाला

इतना खर्चा तो प्रधानमंत्री का भी नहीं है : पिछले तीन साल में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत, सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन साल में जितनी रकम उनकी निजी विदेश यात्राओ पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..एक सूचना के अनुसार पिछले तीन साल में सरकार ने करीब एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये सोनिया के विदेश दौरे के उपर खर्च किये है ..कैग ने इस पर आपति भी जताई तो दो अधिकारियो का तबादला कर दिया गया .
अब इस पर एक पत्रकार रमेश वर्मा ने सरकार से आर टी आई के तहत निम्न जानकारी मांगी है :

  1. सोनिया के उपर पिछले तीन साल में कुल कितने रूपये सरकार ने उनकी विदेश यात्रा के लिए खर्च किया है ?
  2. क्या ये यात्राएं सरकारी थी ?
  3. अगर सरकारी थी तो फिर उन यात्राओ से इस देश को क्या फायदा हुआ ?
  4. भारत के संविधान में सोनिया की हैसियत एक सांसद की है तो फिर उनको प्रोटोकॉल में एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा कैसे मिला है ?
  5. सोनिया गाँधी आठ बार अपनी बीमार माँ को देखने न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में गयी जो कि उनकी एक निजी यात्रा थी, फिर हर बार हिल्टन होटल में चार महगे सुइट भारतीय दूतावास ने क्यों सरकारी पैसे से बुक करवाए ?
  6. इस देश के प्रोटोकॉल के अनुसार सिर्फ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही विशेष विमान से अपने लाव-लश्कर के साथ विदेश यात्रा कर सकते है तो फिर एक सांसद को विशेष सरकारी विमान लेकर विदेश यात्रा की अनुमति क्यों दी गयी ?
  7. सोनिया गाँधी ने पिछले तीन साल में कितनी बार इटली और वेटिकेन की यात्राएं की है ?

मित्रों कई बार कोशिश करने के बावजूद भी जब सरकार की ओर से कोई जबाब नहीं मिला तो थक हारकर केंद्रीय सूचना आयोग में अपील करनी पड़ी.
केन्द्रीय सूचना आयोग प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय के गलत रवैये से हैरान हो गया .और उसने प्रधानमंत्री के उपर बहुत ही सख्त टिप्पणी की

  1. केन्द्रीय सूचना आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी दौरों पर खर्च हुए पैसे को सार्वजनिक करने को कहा है। सीआईसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके निर्देश भी दिए हैं। हिसार के एक आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय से सोनिया गांधी के विदेशी दौरों, उन पर खर्च, विदेशी दौरों के मकसद और दौरों से हुए फायदे के बारे में जानकारी मांगी है।
  2. 26 फरवरी 2010 को प्रधानमंत्री कार्यालय को वर्मा की याचिका मिली, जिसे पीएमओ ने 16 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय को भेज दिया। 26 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय ने याचिका को संसदीय कार्य मंत्रालय के पास भेज दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय के इस ढ़ीले रवैए पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सूचना आयुक्त सत्येन्द्र मिश्रा ने निर्देश दिया कि भविष्य में याचिका की संबंधित मंत्रालय ही भेजा जाए। वर्मा ने पीएमओ के सीपीआईओ को याचिका दी थी। सीपीआईओ को यह याचिका संबंधित मंत्रालय को भेजनी चाहिए थी।

आखिर सोनिया की विदेश यात्राओ में वो कौन सा राज छुपा है जो इस देश के " संत " प्रधानमंत्री इस देश की जनता को बताना नहीं चाहते ? !

(यह बहुत बड़ा आलेख मुझे रजनी सक्सेना ने भेजा है. इसे मेरे मित्र साझा कर सकते हैं.)

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

मीडिया का शीर्षासन - भाग-२

विनोद शर्मा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न

ध्यान रहे विनोद शर्मा के अखबार ने भी उस फर्जी सीडी को सच्चा बताया है. इन दोनों अख़बारों ने किसी प्रयोगशाला का नाम तक बताना उचित नहीं समझा और न ही किसी विशेषज्ञ का नाम बताया है. इस पर श्री विनोद शर्मा जी स्रोत की गोपनीयता की झूठी दुहाई देते हैं. वे बड़ी शान से सीना पीटकर खुद को बड़े ईमानदार पत्रकार बताते हैं. लेकिन किस प्रयोगशाला में किस विशेषज्ञ के जरिए सीडी की जांच करायी गयी, वे नहीं बताते. इसीसे उनकी और उनके अखबार की नीयत (या बदनीयत) का पता चल जाता है.

अर्णब ने अपने कार्यक्रम में उन्हें बहुत अधिक छूट दे रखी थी. तभी वे कहते हैं कि वे करोड़ों में नहीं खेल रहे, वे अब भी मध्य वर्गीय जीवन जी रहे हैं. और अपने बल पर इस मुकाम पर पहुंचे हैं. सही कहा! लेकिन सच यह भी है कि मध्य वर्ग का हर आदमी ईमानदार नहीं होता. कुछ लोग सौ-दो सौ में भी बिक जाया करते हैं. कुछ लोग छोटे-मोटे पदों के लिए भी अपने ईमान का सौदा कर लिया करते हैं. क्या आप भी ऐसे ही छोटे-मोटे आदमी हैं? और हर करोड़पति भ्रष्ट नहीं होता. अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी आदि अनेक लोग करोड़पति बन चुके हैं. क्या विनोद शर्मा उन्हें भ्रष्टाचार के जरिए करोड़पति बना बताएंगे?

बहरहाल, अमर सिंह की तरह आलतू-फालतू बकवास करने के बजाय विनोद शर्मा और उनके अखबार ने अगर सीडी की जांच करने वाली प्रयोगशाला के बारे में बता दिया होता तो उनकी पत्रकारी नैतिकता प्रमाणित हो जाती. वैसे भी विनोद शर्मा को घुमा-फिराकर कांग्रेस के बचाव में ही सुना जाता रहा है. इससे इस सीडी कांड के पीछे कांग्रेस के हाथ की पुष्टि होती है. ऊपर से महान ईमानदार मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की इस मुद्दे पर अब तक की चुप्पी भी इसी ओर इशारा कर रही है, जबकि अन्ना हजारे ने पत्र लिखकर सोनिया गांधी से इस बाबत जवाब भी माँगा है कि क्या वे भी दिग्विजय और सिब्बल के भ्रामक प्रचार अभियान से सहमत हैं. अब सोनिया गांधी इसका जवाब देने के लिए अपने “सलाहकारों” से सलाह ले रही होंगी. उनका जवाब चाहे जो भी आये, मगर इतना तय है कि कांग्रेस का प्रत्यक्ष-परोक्ष फूट डालो अभियान जारी रहेगा. विनोद शर्मा जैसे पत्रकार अब खुलकर भ्रष्टों के समर्थन में अपने पवित्र पेशे का दुरूपयोग करने में जुट गए हैं.

पत्रकार जगत तथा ईमानदार श्रमजीवी पत्रकारों को दलाल किस्म के पत्रकारों का बहिष्कार करना चाहिए.

उम्मीद थी कि अर्णब भी ऐसा ही करेंगे, लेकिन उन्होंने विनोद शर्मा को इतनी छूट देकर अपने सारे किये-कराये पर पानी फेर दिया. आखिर वे भी क्या करें, उन्हें तो उसी कम्पनी की चाकरी करनी पड़ रही है जिसके अखबार ने भी प्रयोगशाला और विशेषज्ञों का नाम बताए बिना सीडी को सच्ची बता दिया है. अब उस कंपनी के मालिकों ने अर्णब की नकेल कस दी है. अब वे भ्रष्टों के तरफ़दारों के बजाय भ्रष्टाचार के विरोध में संग्राम चलाने वालों को अपने कठघरे में खड़ा करने लगे हैं. अर्णब का यह पतन पूरी पत्रकारिता का पतन है. लेकिन जब तक बड़े सेठों और दो नंबरियों के हाथों में पत्रकारिता की कमान रहेगी, तब तक पत्रकारिता के पतन पर आम लोग इसी तरह आंसू बहाते रहेंगे. भला हो लघु पत्रिकाओं और इंटरनेट की सामाजिक पत्रकारिता का, वर्ना अनेक दुष्कर्म दबे रह जाते.

याद करें, नीरा राडिया कांड को तथाकथित मुख्यधारा के अखबारों तथा चैनलों ने किस तरह दबा दिया था. उस समय अगर छोटे अखबारों और इंटरनेट की सामजिक पत्रकारिता ने हंगामा खड़ा नहीं किया होता तो २ जी मामला भी शायद सामने नहीं आया होता और अनेक “बड़े पत्रकारों” के दलाल चेहरे भी दबे-छिपे होते. बड़े अफ़सोस की बात है कि भारत में हिंदी के लेखक-पत्रकार इस सामाजिक मीडिया का सही इस्तेमाल करके किसी सामजिक क्रांति का रास्ता साफ़ नहीं कर रहे. बल्कि अंग्रेजी में यह काम किया जा रहा है. हिंदी के देशभक्तों को सेठिया अखबारों और चैनलों के जाल से बाहर आकर इस सामाजिक मीडिया को एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए. यह आम जनता का अपना मीडिया है. जब इस पर भी लगाम लगाई जाने लगेगी तब कोई और रास्ता निकाला जाएगा. फिलहाल इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाय.


जारी...... कृपया kiranshankarpatnaik.blogspot.com के ब्लॉग आलेख पढ़ा करें.

सोनिया चुप क्यों?

कांग्रेसी नेताओं और उनके अमर सिंह जैसे भ्रष्ट साथियों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी महा-आंदोलन के खिलाफ चरित्र हनन का साजिशाना अभियान चला रखा है, लेकिन कांग्रेस-संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुप्पी साध रखी है. प्रधानमंत्री भी चुप हैं. जबकि ये दोनों और राहुल गांधी ने अब जोर-शोर से खुद को सबसे बड़ा भ्रष्टाचार विरोधी सेनानी बताना शुरू कर दिया है. इसके बाद भी इन लोगों ने कांग्रेसी नेताओं के षड्यंत्र पर मौन साध रखा है.

आज अन्ना हजारे ने पत्र द्वारा सोनिया गाँधी से इसका जवाब चाहा है. उनका सवाल है कि क्या वे यानि सोनिया कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह के बयान से इतेफाक रखती हैं? गौरतलब है कि दिग्गी राजा ने समिति और इसके सदस्यों को बदनाम करने के लिए अनाप-शनाप आरोप लगाए थे, जिनके कोई प्रमाण पेश नहीं किये गए. न कोई हिसाब-किताब पेश किया गया. उनका यह भी कहना था कि अन्ना के अनशन के लिए ५० लाख रुपये खर्च हुए. जिस दिग्गी राजा को कांग्रेस सरकार के लाखों करोड के घोटाले दिखाई नहीं देते, उसे ५० लाख का खर्च खटकने लगा है. हैं हैरानी की बात! इसे कहते हैं चोर मचाये शोर!! और फिर उन्होंने इस ५० लाख का ब्योरा भी पेश नहीं किया है. ये पैसे कहाँ से आये, इस महान सज्जन दीग्गी को इस बात की भी जानकारी नहीं! किसी गंजेड़ी-भंगेड़ी की तरह वे कुछ भी अनाप-शनाप प्रलाप किये जा रहे हैं.

बहरहाल अन्ना हजारे ने सोनिया से पूछा है कि क्या वे दिग्विजय के उक्त बयान और चरित्र हनन अभियान से सहमत हैं? इस सवाल का जवाब सोनिया को देना ही होगा, वरना लोगों में यही सन्देश जाएगा कि खुद सोनिया और मनमोहन के इशारे पर यह साजिशाना मुहिम चल रही है.

इसके अलावा मनमोहन सिंह और राहुल गाँधी को भी चाहिए कि वे अपने भ्रष्ट कांग्रेसियों से ऐसी मुहिम बंद करने को कहें और जो लोग ऐसी मुहिम में शामिल पाए जाएँ उन्हें पार्टी से बर्खास्त करके उनकी पूरी संपत्ति पर जांच बिठा दी जाय. ऐसा करके ये लोग खुद को सचमुच का ईमानदार साबित करेंगे. और नहीं किया तो आम आदमी इन्हें भी भ्रष्टों की कतार में खडा देखेगा.

राहुल गाँधी हीरो बने बिना भी ऐसे षड्यंत्रकारी कांग्रेसियों की नकेल कस ही सकते हैं. काम पर यकीन करने वाले राहुल को यह काम तुरंत करना चाहिए. काम खुद दिखता है. वे काम करेंगे तो दिखेगा भी. आज तक उन्होंने कोई काम किया ही नहीं तो दिखता कैसे? है न! और जो दिख रहा है वो है महा-भ्रष्टाचार. कांग्रेस-संप्रग-मनमोहन-सोनिया-राहुल सरकार का महा-भ्रष्टाचार!!!

अब तो काम दिखाओ भई.

और एक हैं महाधूर्त सिब्बल. इनके चेहरे से ही धूर्तता टपकती है. एक तरफ अन्ना-अन्ना कहते उनकी जुबान नहीं थकती तो दूसरी और अन्ना यानि उनके आंदोलन के खिलाफ नित नए ज़हर उगल रहे हैं यानी लोगों में भ्रम फैलाने में लगे हुए हैं. अन्ना ने सोनिया से यह भी पूछा है कि क्या वे सिब्बल जैसों की बातों का समर्थन करती है? अगर नहीं तो उन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा. सांड की तरह क्यों छुट्टा छोड़ रखा गया है. अगर अन्ना आंदोलन के विरुद्ध कांग्रेसी साजिश को तुरंत बंद नहीं किया गया तो जनता यही समझेगी कि इसे सोनिया का आशीर्वाद मिला हुआ है.

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार का दूसरा नाम शरद पवार

शरद पवार को बिना देर लगाए तुरंत केंद्र सरकार से निकाल देना चाहिए, वरना और न जाने कितने भ्रष्टाचार के मामले सामने आएँगे.

जहाँ भी हाथ डालो शरद पवार का भ्रष्टाचार सामने आ जाएगा. खाद्य पदार्थों की अंधाधुंध महँगाई की बात हो या आईपीएल के महा घोटाले की या २ जी घोटाले की बात हो या तेलगी का अरबों का घोटाला. सब जगह पवार और उसके परिवार और उसके दल के नेताओं का नाम पाया जा सकता है.
प्याज, अंगूर, चीनी, सहित तमाम तरह के खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ाकर करोड़ों रुपए कमाने वाले पवार एंड कम्पनी ने ग़रीबों के मुंह से निवाला छीन लेने का दुष्कर्म किया है. ऐसे मंत्री को मनमोहन सिंह की भ्रष्ट सरकार ही बर्दाश्त किये हुए हुई. वरना कोई अन्य सरकार होती तो पवार को कबका मंत्रिमंडल से धकिया दिया जाता. "गठबंधन धर्म" का नाम लेकर मनमोहन-सोनिया इस महा-भ्रष्टाचारी को पाल-पास रहे हैं.
दरअसल, पवार के जरिए खुद कांग्रस भी अपना उल्लू सीधा कर रही है. ध्यान दें कि पहले सिर्फ पवार को महंगाई का दोषी ठहराया जाता था, लेकिन बाद में खुद प्रणव मुखर्जी, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी शरद पवार की बोली बोलने लग गए .

शरद पवार जिस तरह सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं ठीक उसी तरह पूरी कांग्रेस भी. प्रधान मंत्री की नाक तले सारे भ्रष्टाचार होते हैं, लेकिन बेचारे भोले-भाले, ईमानदार, स्वच्छ मनमोहन को इसका पटा ही नहीं चलता!
शरद को हटाया तो पूरी कांग्रेस का भ्रष्टाचार भी एक-एक कर सामने आ जाएगा. ए. राजा के हटाने से पहले भी कांग्रेस इसी दुविधा में थी. लेकिन करूणानिधि के साथ किसी अंदरूनी "समझौते" के तहत ए. राजा को गिरफ्तार करके मनमोहन-सोनिया खुद को बड़े शुद्ध दिखाने में जुट गए. लेकिन पवार के ऊपर कोई "करूणानिधि" नहीं है. वे खुद ही सर्वेसर्वा हैं. ऐसे में उन्हें हटाना लगभग असंभव है, क्योंकि उनका मुंह बंद नहीं किया जा सकता.

ऐसी हालत में इस मनमोहन-सोनिया-राहुल सरकार को ही हटाना जरुरी हो गया है. पवार, मनमोहन, सोनिया, राहुल, करूणानिधि, ममता, फारुख आदि सभी एक ही भ्रष्ट थैली के चाटते-बट्टे हैं. ममता का नाम यहां इसीलिए लिया गया क्योंकि सारे भ्रष्टाचार उनकी आंखों के सामने एक-एक कर सामने आ रहे हैं और वे गांधी की तीन बन्दर की नकल कर रही हैं. यह उनका असली चेहरा है.