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रविवार, 12 जून 2011

जन-आदोलन की जीत को बाबा की हार बताने पर तुली कांग्रेस!

जन-आदोलन की जीत को बाबा की हार बताने पर तुली कांग्रेस!

यह बाबा की हार नहीं, जन-आन्दोलन की जीत है. इसे बाबा की हार बताकर यह भ्रष्ट और तानाशाह कांग्रेस सरकार जन-आन्दोलन को कमजोर करने की कोशिश में है. ध्यान रहे, यह आन्दोलन न बाबा का है, न अन्ना का है, न किसी दल विशेष का. यह जनता का आन्दोलन है. अन्ना और बाबा इस आन्दोलन के एक नेता हैं. कुछ लोगों को यह गलतफहमी है कि यह किसी व्यक्ति विशेष का आन्दोलन है.


अन्ना और बाबा भी इस आन्दोलन को नेतृत्व देने तभी आये, जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम लोगों का रोष उग्र से उग्रतर होने लगा और विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर कोई बड़ा आन्दोलन नहीं चलाया. अन्ना ने देशव्यापी आन्दोलन शुरू किया और उन्हें तुरंत-फुरंत एक जीत मिल गयी. ऐसी जीत बाबा को नहीं मिली. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे विफल हो गए, जैसा कि कुछ दलाल चैनल और दलाल अखबार बताने के प्रयास में हैं.


बाबा के आन्दोलन का असर साफ़ देखा जा रहा है. कांग्रेस सरकार को मजबूरी में ही सही, काले धन के खिलाफ थोड़ी-बहुत कार्रवाई करनी पड़ रही है. बाबा की अधिकांश मांगें दिखावे के लिए ही सही इस सरकार ने मान ली है. और जब तक जन-आन्दोलन चलता रहेगा, सरकार को कार्रवाई करते रहना पड़ेगा. यह सच है कि बाबा को तुरंत वैसी सफलता नहीं मिल पायी, जैसा कि अन्ना को मिली. तो इसकी वजह यह है कि बाबा न तो कांग्रेस सरकार की तरह महाधूर्त हैं, और न ही वे अन्ना की तरह मंजे हुए पुराने आन्दोलनकारी हैं. इसके अलावा उनके सलाहकार भी उतने परिपक्व नहीं हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि उनका मुद्दा पिट गया. बल्कि उनके मुद्दे को एक नयी जान मिली है. लोगों में इस भ्रष्ट और तानाशाह सरकार के खिलाफ गुस्से में इजाफा हुआ है. जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ और अधिक जुझारू दिख रही है. इसे क्या हार कहते हैं?


किसी भी आन्दोलन में कभी पीछे भी हटना पड़ता है. कभी जान-बूझकर तो कभी मजबूरन. युद्ध की भी यही रणनीति है. इसका मतलब यह हुआ कि हम और अधिक मजबूती के साथ हमला करेंगे. बाबा भी ऐसा ही करेंगे. उनका भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन और ज्यादा शक्ति के साथ चलेगा. और अधिक सुचारू तथा परिपक्व बनेगा. आम लोगों को ऐसी ही उम्मीद है.


अन्ना और बाबा के नाम एक पंखुडी

अन्ना और बाबा के नाम

पखुड़ी पाठक की कविता

मुझे खुद-सा बनाने वाले तुझे दिल याद करे


मेरी तकदीर की तस्वीर सजाने वाले

तुझे दिल याद करे.

मेरे मनमीत मेरा साथ निभाने वाले

तुझे दिल याद करे.

लग्न की डोर खुद से ऐसी बाँधी है

कि कोई इसे तोड़ ना सके.

आयें कितनी भी आंधियां

बनके फानूस हिफाजत मेरी करने वाले

तुझे दिल याद करे.

मेरी तकदीर की तस्वीर सजाने वाले

तुझे दिल याद करे.

नहीं कोई तुमसा प्यारा मुझे ज़माने में

कोई बसता है मेरे दिल के आशियाने में

ऐ खुदा दोस्त,

मुझे खुद-सा बनाने वाले

तेरा आभार करने

तुझे दिल याद करे.

(यह कविता अन्ना और बाबा को समर्पित है. जिन्होंने न जाने कितनों को भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में शामिल करके अपना जैसा बना लिया.)

बुधवार, 8 जून 2011

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव सावधान!

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को चंद भ्रष्टाचारियों को छोड़ लगभग सारे भारतीयों का समर्थन है. जब देश की सभी राजनीतिक दल इस मामले में विफल और निकम्मे साबित हो गए, तब अन्ना और बाबा ने इस बहुत ही महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे को अपने हाथों में लिया और देश भर में नव-जागरण पैदा किया. इनकी वजह से आज यह आन्दोलन एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंचा है कि मामला आर-पार का बन गया है.

ऐसे वक्त अन्ना और बाबा को मिलकर इस आन्दोलन को आगे बढ़ाना चाहिए. और एक हद तक ऐसा हो भी रहा है. लेकिन कुछ राजनीतिक दल इस राष्ट्रीय आन्दोलन की लोकप्रियता का घर बैठे लाभ उठाने की फिराक में हैं. अन्ना और बाबा को ऐसे दलों से सावधान रहने की ज़रूरत है. इन दोनों का आन्दोलन शुद्ध रूप से गैर-राजनीतिक है. इसे राजनीतिक रंग देने से बचना जरुरी है. और ऐसे दलों को भी चाहिए कि जब जनता का एक स्वतःस्फूर्त जन-आन्दोलन चल रहा है, तो वे वहां जबरन या चतुराई से अपनी नाक न घुसेड़े.

वे अपने बल पर अपना अलग आन्दोलन चला सकते हैं. अगर ईमानदारी से वो आन्दोलन चलाये गए तो निश्चित तौर पर उन्हें भी जनता का भरपूर समर्थन मिलेगा. किसी दूसरे की मेहनत की कमाई पर माल-मलाई खाने का लालच छोड़ दें, इससे आन्दोलन को नुकसान पहुंचेगा और भ्रष्ट सरकार मजे करेगी. मैं खासकर भाजपा से कहना चाहता हूं कि उसने आज तक महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कोई बड़ा देशव्यापी आन्दोलन खड़ा नहीं किया, जबकि उसके पास अवसर थे. अब वह अन्ना या बाबा के पीछे लगकर मुफ्त की मलाई खाने की मंशा से बाज आ जाय.

अभी भी समय है, वह अपने बल पर या संयुक्त विपक्ष (जितना संभव हो) का एक अलग आन्दोलन चलाये और अन्ना तथा बाबा के आंदोलनों को जरा दूर रहकर समर्थन भी देती रहे. विपक्ष के अपने स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उसकी गिरी हुई साख फिर से ऊपर आ सकती है. फिलहाल, अन्ना-बाबा कोई चुनाव नहीं लड़ने वाले. सो, सकारात्मक आन्दोलन का चुनावी लाभ आन्दोलनकारी विपक्ष को ही मिलेगा.

भाजपा सहित तमाम तरह का विपक्ष इस बात को याद रखे कि अगर अन्ना और बाबा का यह आन्दोलन विपक्ष की वजह से कमजोर हुआ या उसमें फूट पड़ी तो जनता भाजपा सहित अन्य सकारात्मक विपक्ष को माफ नहीं करेगी. अन्ना-बाबा भी इनसे ज़रा दूरी बनाए रखें, इसीमे आन्दोलन का भला है. (मित्रों, कृपया इस लेख को आपलोग अपने वाल पर लगाएं और अपने मित्रों को भी भेज दें.

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे का देशव्यापी दौरा शुरू

आखिरकार अन्ना हजारे का देशव्यापी अभिया शुरू हो गया. सबसे पहले वे ऊतार प्रदेश का दौरा करेंगे. दिल्ली के करीब होने और सबसे बड़ा राज्य होने के कारण ही यह फैसला लिया गया. वैसे भी वहाँ के लोग मायावती के मनमाने राज से विरक्त हो चुके हैं. इसीलिए इस अभियान को अच्छे समर्थन की उम्मीद की जा रही है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की तोप का मुंह अब उत्तर प्रदेश की ओर है. वे इसी शुक्रवार को बनारस से अपनी मुहिम शुरू करेंगे. अन्ना हजारे का काफिला बनारस से सुल्तानपुर होते हुए रविवार पहली मई को लखनऊ में सभा करेगा.

मायावती ने अन्ना हजारे से सीधे मोर्चा लेते हुए प्रस्तावित जन लोक पाल विधेयक की मसौदा समिति में दलित प्रतिनिधि न होने के लिए उन्हें गुनहगार बता दिया है. साथ ही समिति के संदिग्ध सदस्यों से दूरी बनाने की सलाह भी दी है.

मायावती की आपत्ति और सलाह अपनी जगह. लेकिन इस बात से कौन इनकार करेगा कि उत्तर प्रदेश पिछले कई सालों से लगातार भ्रष्टाचार में डूबता जा रहा है. मायावती ने स्वयं हाल ही में अपने दो मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया है.

हर जुबान पर चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों से अवैध वसूली के आरोप लगते रहे हैं. और यह भी किस तरह दो बिजनेस परिवार यहाँ हर सरकारी ठेका पा रहे हैं.

इससे पहले जो सरकार थी उस पर भी दो चार बिजनेस घरानों को ही फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार के साथ कम कर चुके दो पूर्व मुख्य सचिवों को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना पड़ा.

सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में कई बार कह चुकी है कि वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में उसकी चार्जशीट तैयार है.

सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश पर सी बी आई इनसे पहले वाले मुख्यमंत्री के खिलाफ भी आय से अधिक मामले की जांच कई साल से कर रही है.

सरकार जनता के पैसे से चलती है. सरकारी सेवक और जन प्रतिनिधि जनता के टैक्स के पैसे से वेतन और तमाम सुख सुविधाएँ पाते हैं. लेकिन वही नागरिक जब किसी काम से, मसलन राशन कार्ड , जाति प्रमाणपत्र, जन्म- मृत्यु प्रमाणपत्र , पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस आदि के लिए सरकारी दफ़्तर जाता है तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ता है.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता भी भ्रष्टाचार से आजिज है. लोगों को अन्ना हजारे से बहुत उम्मीदें भी हैं. उनके दो-एक साथियों के खिलाफ दुष्प्रचार की हवा निकाल जाने से अन्ना आन्दोलन की विश्वसनीयता बढ़ी है. और अमर सिंह तथा दिग्विजय सिंह जैसों की साख और अधिक खराब हुई है.

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

शेखर कपूर की एक कविता (अन्ना हजारे के लिए)

एक रोटी हमें भी दो

एक रोटी हमें भी दो
कुछ जीने का हक तो हमें भी दो

नहीं मांगते हम आपकी ऊंची इमारतें
थक जायेंगे जहाँ
अपने आप को ही ढूँढ़ते ढूँढ़ते
छू लेंगे हम भी आसमान को
अपनी ही औकात से

लेकिन

एक रोटी हमें भी दो
कुछ जीने का हक तो
हमें भी दो

आपके बच्चे फलें फूलें
विदेश जाके खूब घूमें
चेहरे पे उनके मुस्कराहट रहे
हमारे बच्चे तो चीखते रहे

एक रोटी हमें भी दो
कुछ जीने का हक तो

हमें भी दो

यह सुनामी जो लाये हैं
हमारे अन्ना
देश को बह ले जाएंगे
हमारे अन्ना
यह हवा जो चली है तूफ़ान बनकर
कहीं पेड़ को ही उखाड़ न दे
उसे जकड़ कर

इससे पहले कि हम सब बह जाएँ

एक रोटी हमें भी दो

कुछ जीने का हक तो
हमें भी दो

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

सोनिया चुप क्यों?

कांग्रेसी नेताओं और उनके अमर सिंह जैसे भ्रष्ट साथियों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी महा-आंदोलन के खिलाफ चरित्र हनन का साजिशाना अभियान चला रखा है, लेकिन कांग्रेस-संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुप्पी साध रखी है. प्रधानमंत्री भी चुप हैं. जबकि ये दोनों और राहुल गांधी ने अब जोर-शोर से खुद को सबसे बड़ा भ्रष्टाचार विरोधी सेनानी बताना शुरू कर दिया है. इसके बाद भी इन लोगों ने कांग्रेसी नेताओं के षड्यंत्र पर मौन साध रखा है.

आज अन्ना हजारे ने पत्र द्वारा सोनिया गाँधी से इसका जवाब चाहा है. उनका सवाल है कि क्या वे यानि सोनिया कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह के बयान से इतेफाक रखती हैं? गौरतलब है कि दिग्गी राजा ने समिति और इसके सदस्यों को बदनाम करने के लिए अनाप-शनाप आरोप लगाए थे, जिनके कोई प्रमाण पेश नहीं किये गए. न कोई हिसाब-किताब पेश किया गया. उनका यह भी कहना था कि अन्ना के अनशन के लिए ५० लाख रुपये खर्च हुए. जिस दिग्गी राजा को कांग्रेस सरकार के लाखों करोड के घोटाले दिखाई नहीं देते, उसे ५० लाख का खर्च खटकने लगा है. हैं हैरानी की बात! इसे कहते हैं चोर मचाये शोर!! और फिर उन्होंने इस ५० लाख का ब्योरा भी पेश नहीं किया है. ये पैसे कहाँ से आये, इस महान सज्जन दीग्गी को इस बात की भी जानकारी नहीं! किसी गंजेड़ी-भंगेड़ी की तरह वे कुछ भी अनाप-शनाप प्रलाप किये जा रहे हैं.

बहरहाल अन्ना हजारे ने सोनिया से पूछा है कि क्या वे दिग्विजय के उक्त बयान और चरित्र हनन अभियान से सहमत हैं? इस सवाल का जवाब सोनिया को देना ही होगा, वरना लोगों में यही सन्देश जाएगा कि खुद सोनिया और मनमोहन के इशारे पर यह साजिशाना मुहिम चल रही है.

इसके अलावा मनमोहन सिंह और राहुल गाँधी को भी चाहिए कि वे अपने भ्रष्ट कांग्रेसियों से ऐसी मुहिम बंद करने को कहें और जो लोग ऐसी मुहिम में शामिल पाए जाएँ उन्हें पार्टी से बर्खास्त करके उनकी पूरी संपत्ति पर जांच बिठा दी जाय. ऐसा करके ये लोग खुद को सचमुच का ईमानदार साबित करेंगे. और नहीं किया तो आम आदमी इन्हें भी भ्रष्टों की कतार में खडा देखेगा.

राहुल गाँधी हीरो बने बिना भी ऐसे षड्यंत्रकारी कांग्रेसियों की नकेल कस ही सकते हैं. काम पर यकीन करने वाले राहुल को यह काम तुरंत करना चाहिए. काम खुद दिखता है. वे काम करेंगे तो दिखेगा भी. आज तक उन्होंने कोई काम किया ही नहीं तो दिखता कैसे? है न! और जो दिख रहा है वो है महा-भ्रष्टाचार. कांग्रेस-संप्रग-मनमोहन-सोनिया-राहुल सरकार का महा-भ्रष्टाचार!!!

अब तो काम दिखाओ भई.

और एक हैं महाधूर्त सिब्बल. इनके चेहरे से ही धूर्तता टपकती है. एक तरफ अन्ना-अन्ना कहते उनकी जुबान नहीं थकती तो दूसरी और अन्ना यानि उनके आंदोलन के खिलाफ नित नए ज़हर उगल रहे हैं यानी लोगों में भ्रम फैलाने में लगे हुए हैं. अन्ना ने सोनिया से यह भी पूछा है कि क्या वे सिब्बल जैसों की बातों का समर्थन करती है? अगर नहीं तो उन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा. सांड की तरह क्यों छुट्टा छोड़ रखा गया है. अगर अन्ना आंदोलन के विरुद्ध कांग्रेसी साजिश को तुरंत बंद नहीं किया गया तो जनता यही समझेगी कि इसे सोनिया का आशीर्वाद मिला हुआ है.

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

राजा-कलमाडी के भाई-बंधुओं का एका

भ्रष्टाचार विरोधी देश व्यापी आंदोलन के खिलाफ ए.राजा और कलमाडी के भाई-बंधुओं ने एकजुट होकर इस आंदोलन में फूट डालने की साजिश शुरू कर दी है.
इसी सिलसिले में सबसे पहले भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया गया. जबकि ऐसी कोई बात नहीं है. नागरिकों की ओर से पांच सदस्यों में दो व्यक्ति रिश्ते में पिता-पुत्र हैं. लेकिन इन दोनों का इतिहास जनता के पक्ष में लड़ने और जनता के पक्ष में ही क़ानून का इस्तेमाल करने की है. दोनों ही क़ानून के बड़े पंडित हैं और इन दोनों से ही यह कांग्रेसी सरकार भयभीत रहती है. यह बात सभी जानते हैं, इसीलिए इस पर विस्तार से लिखने की जरुरत नहीं.
इस समिति में नागरिकों की ओर से एक ऐसे व्यक्ति भी हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार मुद्दे पर कर्नाटक की भाजपा सरकार की नाक में दम कर रखा था और अब भी ऐसा ही कर रहे हैं. अन्ना हजारे ने उन्हें भी इस समिति में शामिल किया है. ऐसे में कांग्रेसियों द्वारा उनके खिलाफ चलाया जा रहा यह दुष्प्रचार कि अन्ना हजारे भाजपा या आरएसएस के आदमी हैं, सरासर दुर्भावना से प्रेरित है. इससे इस कांग्रेसी सरकार की मंशा सामने आ जाती है.

अन्ना हजारे ने इससे पहले महाराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना सरकार के खिलाफ भी बड़ा आंदोलन चलाया था, उस कारण भी उस सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा. इसीलिए हजारे को भाजपा की कठपुतली कहने वाले जरुर ही भ्रष्टाचारियों के दलाल हैं या खुद ही भ्रष्टाचारी हैं. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि शिवसेना को अन्ना हजारे का यह आंदोलन उतना पसंद नहीं है. इसीलिए उसके कई नेताओं ने इस आंदोलन से कोई फायदा नहीं होने की बात कही है. ऐसी बात कांग्रेसी सिब्बल भी कह रहे हैं. जन लोकपाल क़ानून से कांग्रसियों को जितनी फ़िक्र है, उतनी ही शिव सेना नेताओं को भी है. एन सी पी और द्रमुक नेताओं को तो है ही, क्योंकि कांग्रसियों के साठ मिलकर इन दोनों संप्रग दलों ने भी देश को जमकर लूटा है और अभी भी लूट रहे हैं.

बहरहाल, अन्ना ने नितीश कुमार के साथ नरेन्द्र मोदी के ग्रामीण विकास की क्या तारीफ़ कर दी, फूट परस्तों को एक और "सुनहरा मौक़ा" हाथ लग गया.

इसमें कोई शक नहीं कि नितीश कुमार ने बिहार की गाडी को पत्री पर लाने का काम किया है. अभी मंजिल बहुत दूर है, लेकिन उलटी दिशा में जा रही गाडी को सही दिशा में मोड देना भी एक बड़ा काम है, इसके लिए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ही जानी चाहिए. उन्होंने रिश्वत के दलदल में डूबे बिहार को थोड़ा बाहर निकालने का भी काम किया है. हालांकि यह काम एक हद तक ही हुआ है, अभी और भी अनेक काम होने हैं.
जहाँ तक मोदी की बात है तो गुजरात दंगों की जितनी आलोचना की जाय कम होगी. इस लेखक सहित अनेकानेक लोगों ने उस दंगे की कटु से कटु आलोचना की है. और अब भी कर रहे हैं. लेकिन गुजरात में हो रहे विकास की अनदेखी भी नहीं की जा सकती. करनी भी नहीं चाहिए. जिस वक्त केंद्र की मनमोहन-सोनिया सरकार सहित विभिन्न राज्य सरकारें जनता के खजाने को लूटने में लगी हुई हैं और विकास के नाम पर लोगों को "भीख" में चावल दिया जा रहा है, मतदाताओं को हजार-हजार रुपए देकर उनके वोट खरीदने की कोशिश हो रही है, तब गुजरात में ज़रा स्वच्छ प्रशासन देने के प्रयास किये जा रहे हैं. राज्य के खजाने से ग्रामीण विकास, नागरिक सुविधाएं दी जा रही हैं, तो उसकी तारीफ़ होनी ही चाहिए. इसमें कहीं से कोई गलत बात नहीं है.

जहां तक साम्प्रदायिकता की बात है तो अन्ना हजारे ने एक दिन पहले एक बार फिर कहा है कि वे साम्प्रदायिकता के सख्त विरोधी हैं. और उन्होंने गुजरात दंगों की आलोचना भी की थी. और अभी भी करते हैं. साथ ही उन्होंने आम लोगों से अपील की है कि भ्रष्टाचारियों के बहकावे में न आयें और आंदोलन को मजबूत बनाने के काम में जुटे रहें.

मल्लिका साराभाई और मेधा पाटकर ने भी मोदी के संदर्भ में अन्ना की आलोचना की है. तो अब ऐसे लोगों को अन्ना की सफाई सुनकर शांत हो जाना चाहिए और इस आंदोलन को शक्तिशाली बनाने के काम को आगे बढ़ाना चाहिए. ऐसे अग्रणी लोगों को बचकाने तरीके से अपना क्षोभ इस तरह प्रकट करके आंदोलन को कमजोर बनाने का काम नहीं करना चाहिए. आंदोलन में फूट पडी या यह आंदोलन कमजोर पड़ा तो ऐसे लोगों को इतिहास माफ नहीं करेगा.

मेधा पाटकर को इस बात का भी दुःख है कि वे जिस मोदी सरकार के खिलाफ नर्मदा आंदोलन चला रहीं हैं, अन्ना ने उसी मोदी की तारीफ़ करके बहुत बड़ा पाप कर दिया है. अन्ना के संदर्भ को उन्होंने या तो समझा ही नहीं या समझकर भी वे नासमझ बन रही हैं. यह बात ठीक नहीं है. इस वक्त हजारे का मकसद जन लोकपाल क़ानून बनाना है. वे इसी सिलसिले में सारे काम कर रहे हैं. साथ ही उन्होंने चलते-चलाते देश के सर्वांगीण विकास की भी चर्चा कर दी. पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने नितीश तथा मोदी के ग्रामीण विकास को एक आदर्श के रूप में पेश कर दिया. इसमें क्या बुरा किया. बात बस ग्रामीण विकास तक की ही है. और कुछ नहीं. इसे जबरन राजनीतिक रूप देने वाले खुद ही कोई साजिश कर रहे हैं या भ्रमित हैं या किसी हीनता के शिकार हैं.

गुजरात में हो रहा विकास निश्चित तौर पर पूंजीवादी विकास ही है. इसका बड़ा फायदा बड़े पूंजीपतियों को ही मिल रहा है. मोदी एक पूंजीवादी नेता ही हैं. और अन्ना हजारे भी कोई कम्युनिस्ट नहीं हैं. वे इसी पूंजीवादी व्यवस्था के तहत कुछ ऐसे जनतांत्रिक सुधर के लिए संघर्ष कर रहे है ताकि हमारा यह देश चोर-लुटेरों-बदमाशों का पूरा स्वर्ग न बन जाय. (वैसे मनमोहन ने इन चोरों-लुटेरों के लिए इसे जन्नत बनाने के सारे उपाय कर रखे हैं. ) अन्ना इतना ही चाह रहे है कि आम जनता भूखी न रहे, आत्महत्या न करे. और इसके लिए सबसे पहले नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को कम करना या समाप्त करना अनिवार्य रूप से जरुरी है. मोदी के शासन में भ्रष्टाचार पर एक बड़े हद तक लगाम लगा रखी गयी है. पूंजीवादी विकास के लिए भी भ्रष्टाचार पर रोक लगाना जरुरी होता है. इसीलिए तो कई पूंजीपतियों ने भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता जाहिर की है, (यह और बात है कि एक के बजाय सौ या हज़ार का फायदा लेना भी भ्रष्टाचार ही है.)

फूट डालने वाली शक्तियां पूरे जोर-शोर से सक्रिय हो गई हैं. जागरूक व ईमानदार लोगों को सावधान रहने और ऎसी किसी भी साजिश को नाकाम करने की जरुरत है.